Bhartiya Parmapara

श्रम बिकता है, बोलो... खरीदोगे?

श्रम बिकता है, बोलो ..... खरीदोगे..?

श्रम बिकता है, बोलो ..... खरीदोगे..? (ऐसा बाजार जहां रोज लगता है मेहनतकशों का मेला) 
भारत में जिस गति से जनसंख्या बढ़ रही है उतनी ही गति से बेरोजगारी भी बढ़ी है। हालात ऐसे बदतर हैं कि डिग्रीधारी युवकों को चपरासी तक की नौकरी भी नसीब नहीं हो पा रहीं है तथा भारत में शिक्षित बेरोजगारी अपने चरमोत्कर्ष पर है। पिता को अपने बेटे की चिंता है कि मेरे बाद इसका क्या होगा। पिता अपने बेटे को लेकर नौकरी की तलाश में दर-दर भटकता है। इस उम्मीद पर कि उसके बेटे को चपरासी की भी नौकरी मिल जाए तो वह चैन की सांस ले सके। हाथों में डिग्रियां एवं आंखों में दिवास्वप्न लिए युवक दर - दर भटक रहे हैं, किंतु उन्हें हर जगह यही बोर्ड टंगा मिलता है, "नौ वेकेंसी"। आखिर जाएं तो जाएं कहां ?  
इलेक्ट्रॉनिक व कम्प्यूटराइजेशन क्रांति ने मानव मशीन की उपयोगिता को कमतर बना दिया है। यही कारण है कि अधिकांशतः शासकीय विभागों में कर्मचारियों की छंटनी के उपाय किए जा रहे हैं व कई शासकीय, अर्द्ध शासकीय विभागों में कर्मचारियों की भर्ती पर रोक लगी हुई है या नाममात्र की वेकेंसी निकल रहीं हैं। वर्तमान समय में आईटी कंपनियाँ भी लगभग पचास प्रतिशत कर्मचारियों की छंटनी कर रही है। हालात ऐसे बन गए हैं कि माता-पिता को अपने बच्चों के भविष्य की चिंता सताने लगी है।

आस्था के जन्म लेते ही हम भारतीय हो गए एक अरब पार और अब 140 करोड़। समस्याएं दिन- पर - दिन बढ़ती ही जा रही हैं। समाज का एक तबका ऐसा है जो आज भी असहाय है तथा वह शिक्षा, चिकित्सा, रोजगार, रोटी व अन्य मूलभूत जरूरतों से वंचित ही है। कुछ लोग इतने बदनसीब भी हैं जिन्हें किसी- किसी दिन रोटी तक नसीब नहीं होती है व फाकामस्ती में ही दिन गुजारने पड़ते हैं। हाथों को रोजगार नहीं, बदन को कपड़ा नहीं और रहने को घर नहीं।

श्रम बिकता है, बोलो ... खरीदोगे..? 
मालवा मिल, गुमास्ता नगर, फूटी कोठी, जूनी इंदौर, रेती मंडी चौराहा, नवलखा चौराहे सहित 20 से 25 ऐसे स्थान है जो मजदूर चौक के रूप में जाने जाते हैं।

जहाँ रोजगार की तलाश में मेहनतकशों का रोज अलसुबह मेला लगता है। इनकी आंखों में सपने होते हैं, पेट में भूख और हाथों में रोटी। ये मजदूर रोजगार हेतु बड़ी तादाद में यहां इकट्ठा होते हैं। इन मजदूरों में बच्चे, युवक - युवतियां व बूढ़े भी शामिल होते हैं। इनमें 13-14 वर्ष के बच्चे से लेकर 60-65 वर्ष तक के वृद्ध भी होते हैं। जरूरतमंद लोग यहां आते है, सौदा करते हैं व इन्हें अपने साथ ले जाते हैं। ये मजदूर प्रतिदिन 400 से लेकर 500 रुपए तक कमा लेते हैं।

बस... इन्हें 10 घंटे कोल्हू के बैल की तरह जुतना पड़ता है। इनमें से कई लोग ऐसे भी होते है जिन्हें किसी दिन कोई खरीदने नहीं आता है, उस रोज वे भूखों तक मरते हैं व फाकामस्ती में ही दिन गुजारना पड़ता हैं और उस दिन माँ बच्चों की तसल्ली के लिए चूल्हे पर खाली डेचकी में सिर्फ़ पानी पकाती है। ये लोग साल में 365 दिन ही ईमानदारी, मेहनत व लगन से काम करते हैं और इन्हें कोई साप्ताहिक अवकाश भी नहीं मिलता है। फिर भी ये हर हाल खुश है। 
ये नींद की आगोश में नीले गगन के तले थककर चूर बेफिक्र हो सो जाते हैं व भोर भए नीरव पंछियों के चहचहाते ही आंख मलकर फिर निकल पड़ते हैं अपने लक्ष्य की ओर रोजगार की तलाश में।

पथराई आंखों में एक स्वप्न है कि रोज-ब-रोज काम ढूंढ़ने की यातना से कभी तो मुक्ति मिलेगी। इसका उत्तर शायद किसी के पास नहीं है? न हमारे पास, न प्रशासन के पास और न ही सरकार के पास।

मेहनतकशों से एक बात कहना है, पढ़ना लिखना सीखो ओ मेहनत करने वालों ...।

लेखक - नलिन खोईवाल जी, इंदौर (मध्य प्रदेश)

                                    

                                      

Login to Leave Comment
Login
No Comments Found
;
MX Creativity
©2020, सभी अधिकार भारतीय परम्परा द्वारा आरक्षित हैं। MX Creativity के द्वारा संचालित है |