आस्था और कौतूहल का संगम - जाख का अग्नि नृत्य
गोठी की परम्परा केदार घाटी के उन 14 गाँवों में प्रचलित है जो श्री केदारनाथ धाम के सबसे नजदीकी गाँव है़। इन 14 गांवों के इष्ट देवता हैं - जाख राजा। जाख राजा को जल एवं अग्नि का देवता माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि क्षेत्र में वर्षा, आँधी आदि से कोई अनिष्ट न हो, ऐसी कामना से इस अनुष्ठान का आयोजन किया जाता है। स्थानीय लोग बताते हैं कि सम्वत 1111 से यह आयोजन होता आया है। प्रतिवर्ष 2 गते वैशाख को सम्पन्न होने वाले इस आयोजन को "गोठी (गोष्ठी)" कहा जाता है। गोठी से पूर्व देवशाल, कोठेडा तथा नारायण कोठी के ग्रामीणों द्वारा एक अग्नि कुण्ड तैयार किया जाता है। इस आयोजन को देखने के लिए दूर-दूर से लोगों का हुजूम यहां आने से यह आयोजन मेले का स्वरूप ले लेता है, जिसे “जाख मेला” कहा जाता है।
गोठी का यह अनुष्ठान मुख्य रूप से चार दिन चलता है। इस दौरान जाख मेले में घण्टे-घड़ियाल बजाना व उपरोक्त तीन गाँवों में गुलाब तोड़ना वर्जित है। तीन दिनों तक इन गाँवों के प्रत्येक परिवार का एक-एक सदस्य सामूहिक रूप से गाजे-बाजों के साथ जंगल से नंगे पाँव बाँज की लकड़ियां लाते हैं, जिसे “मूनी काटना” कहते हैं।
वैशाख संक्रांति को श्री विन्ध्यवासिनी मन्दिर देवशाल से जाख देव की उत्सव मूर्ति भव्य शोभा यात्रा के साथ जाखधार मन्दिर पहुँचती है। जाखधार वह स्थान है जहाँ यह आयोजन होता है। वैशाख संक्रांति को मन्दिर परिसर के अग्निकुंड में जलाने के लिए लकड़ी के गेलों (काष्ठ खण्डों) का चयन विधि-विधान से किया जाता है। अग्नि कुण्ड में 11 लकड़ियां लम्बाई तथा 11 लकड़ियां चौड़ाई में वर्गाकार बिछाई जाती हैं। इन लकड़ियों की लम्बाई 6-7 फुट होती है। लकड़ियों का यह ढेर 20 फुट तक ऊँचा होता है। संक्रांति की रात 9 से 10 बजे के मध्य मुहूर्त अनुसार लकड़ियों के इस ढेर की विधि-विधान से पूजा-अर्चना कर, रिंगाल की लकड़ी द्वारा अग्नि प्रज्वलित की जाती है।
2 गते वैशाख को अपराह्न 2 से 3 बजे के मध्य रात भर जलाई गई इन लकड़ियों से बने धधकते अंगारों में, जाख का नर पश्वा इन धधकते अंगारों के ढेर में प्रवेश कर, इसे पार कर दूसरी तरफ पहुंचता है।
दूर-दूर तक पहुँच रही आग की हल्ग्वांर (अंगारों की ज्वाला/गर्मी) से दर्शक इस कुण्ड के नजदीक ठहरना तो दूर, जाने में भी घबराते हैं। तब किसी देव पश्वा के रूप में इस कुंड में किसी मानव का प्रवेश, नास्तिक से नास्तिक व्यक्ति के मन में भी आस्था जगा देता है। हमारे वेद-पुराणों में वर्णित है कि हवन-यज्ञ के द्वारा प्रकृति की अनंत शक्तियों के मध्य सामंजस्य एवं संतुलन स्थापित करके ब्रह्माण्डीय ऊर्जा को विस्तारित एवं संतुलित किया जाता है। सामवेद के मंत्रों की संगीतमय ध्वनि एवं निर्धारित शब्दों की आवृत्ति मुक्त निश्चित क्रम के स्पंदनों से साधक का मस्तिष्क पूर्णतः एकाग्र हो जाता है। साधक की यही एकाग्रता उसे बड़े से बड़े असम्भव कार्यों को करने की प्रेरणा एवं शक्ति देती है। ऐसा ही कुछ इस आयोजन में भी देखा जा सकता है।
हमारी धार्मिक आस्था और विश्वास कहीं न कहीं हमें संदेश देती है कि भले ही हम दिनों दिन विज्ञान के क्षेत्र में प्रगति कर रहे हैं लेकिन अभी तक हम आस्था के पीछे की ताकत का रहस्य नहीं खोल पाये हैं। हमें विज्ञान पर भरोसा करते हुए अपनी धार्मिक आस्थाओं और रहस्यों की तह तक पहुंचने के लिए वैज्ञानिक कसौटियों पर कसते हुए, आगे बढ़ने के लिए एक लम्बी यात्रा पूरी करनी है।
लेखक - हेमंत चौकियाल जी, रूद्रप्रयाग (उत्तराखंड)

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