Bhartiya Parmapara

बसंत ऋतु में होली – फागुन, प्रकृति और रंगों के उत्सव का मनोहारी वर्णन

बसंत ऋतु में होली

बसंत ऋतु में प्रकृति नटी अपने संपूर्ण सौंदर्य के साथ इठलाने लगती है। संपूर्ण सृष्टि में सरलता व्याप्त हो जाती है एवं रचनात्मक प्रक्रियाएं प्रारंभ हो जाती हैं। ऋतुराज वसंत का स्वागत करने फागुन दौड़ा चला आता है। ऐसा लगता है बावरा हो बौंरा गया हो और मस्ती के आलम में इतरा रहा है। यह शोख-चंचल मौसम जोकर दिखाएं वह कम है। इसकी लीलाएं अजब है, गजब की मादकता वाले इसके अंदाज हैं। इसके आते ही पलाश के वनों में आग सी लग गई है जिसकी सुर्ख लालिमा से वातावरण दग्ध हो गमक उठा है। मंद मंद सुगंधित पवन बहता है, हवा सांय सांय करती खिल उठती है मानो नश्तर से चुभो देती है। वन उपवन एक मादक गंध से आपूरित हो उठे हैं। कोकिला की मीठी तान आम्र कुंजो में गूंज उठी है। कुहू कुहू कर बोल रही है सुन रे भैया मोर वन उपवन में देखो इत-उत छाई घटा निराली लतर-बदर फूलों से देखो झूम रही है डाली डाली। कलियां अभिनंदन कर रही हैं। वासंती चूनर ने अपनी डोली फैलाई है कि प्रकृति कई रंगों में रूपमती हो मुस्कुरा उठी है।

सर्दी के दिन दूर हो गए हैं और गर्मी की ऋतु ने अपना आंचल फैलाना आरंभ कर दिया है। चारों ओर सौंदर्य का पान करने अंबर भी मानो झुक सा गया है और धरती मां भी इंद्रधनुषी आभा पा खिल उठी है। गुनगुन करते भौंरे भी घूम घूम कर सारंगी बजा रहे हैं और पत्तों को भी नर्तन सिखा रहे हैं। तितलियां भी अपनी सतरंगी घाघर पहनकर इधर-उधर डोलती फिर रही हैं। यह फागुन ही तो है जिसके आगमन के साथ ही नई चेतना का संचार होता है। गोचर अगोचर को फागुन ने अपने मनोहरी पाश में भर लिया है और कोंपलों पर फूटा है नया लावण्य कठफोड़वा आम के वृक्ष में अपनी कारीगरी से कोटर बना रहा है और हरियल तोतों की बारात बागों में आकर बैठ गई है। गुलाब की क्यारी में बहार ने अपना डेरा जमा लिया है और मैदानों में छिटक उठी है नन्हे नन्हे गुलाबी, बैंगनी ऊदे फूलों की आहट, धरा रंग उठी है मदमस्त प्रणय और उत्पत्ति के रंगों में।

वसंत के आते आते ही मन उमंग और उल्लास से परिपूर्ण होने लगता है। पपीहे का राग प्रेम के रंग में ढल कर हल्की हंसी बिखेर रहा है और पीहू पीहू की रट लगाए मदमाती ऋतु को प्यार की पहचान दे रहा है। सरसों तो पूरी की पूरी पीत रंग की चुनरिया ओढ़े सज उठी है। खेत खलिहानों में मंथर गति से चलती बयार के डैनो पर सवार अठखेलियां करता फागुनराग अपने साथ मनुहार की बेला का उपहार लाया है। फल स्वरुप गांव गांव डप की थाप पर थिरकते तन श्रृंगार के गीत गाने लगते हैं। कहीं दूर अलगोजे पर कोई गा रहा है फागुनी गीत और आसमान से उतर रहा है इस मदमस्त मधुमास का मादक संगीत। कौन सा फूल या कली इससे अछूती है और प्रस्फुटित हो सुगंध से सराबोर ना हुई है। गांव, डगर, चौपालों में जन-जन के मन में रंजकता के रंग मस्ती में डूब गए हैं। इसी का सानिध्य पा माधवी और मोगरे की जुगलबंदी का क्या कहना और मौलश्री भी अपने आप झर रही है। अचेतन पहाड़ी भी नए उल्लास से नहा उठी है। आम भौंरा रहा है और नए पत्तों की पांत जरा सी हवा से भी हिल डुल कर लहक-लहक जाती है। प्रेम का पहाड़ा याद करने की उम्र में लहलहाते खेतों के द्वार पर दस्तक दी है और फागुन कहां नहीं है कोई कह नहीं सकता।



          

 

मस्ती के आलम का नशा नव संचार कर रहा है। धरती के, वृक्षों के पोर -पोर चटकने लगे हैं। उज्जवल वासंती वातावरण और चारों तरफ शीतल मद-सुगंध से पूरित पवन की अठखेलियों के कारण रंगीनियों और भी बढ़ जाती हैं। जब फागुनी बयार चलती है तो तन मन भी फागुनी होकर नाचने लगता है और फिर रंग रंगीले, चटकीले रंगों से भिगोती इठलाती, इतराती, बलखाती होली फिर से द्वार खटखटाते हुए पहुंचती है। चौपाल में भी खनक की आवाज गूंज उठती है, ढोलक की थाप, ढोल की पद चाप और झाल-मंजीरो की झंकार से वातावरण से वातावरण खुशियों की डोर लिए झूम उठता है। मस्तों की टोली हंसी -ठिठोली करती इधर-उधर घूम रही है।

बच्चे बूढ़े, जवान सभी होली का स्वागत बिना किसी भेदभाव के विविध रंगों में सजकर, संगीत की स्वर माधुरी और नृत्य की थिरकन के साथ मस्ती के आलम में खो जाते हैं। नीले -पीले, लाल-गुलाबी रंगों की बहार आई है। मुट्ठी भर भर अभी गुलाल के हथेलियां से भरे बादल इधर-उधर उड़ते फिर रहे हैं। गांव-नगर, सड़कों गलियों, चौबारों में धूम मची है और खिलखिलाती होली आ पहुंची है।

टेसू के फूलों से भरे रंगीन हौंदो ने चारों ओर शोर मचाया है और राग रंग बरसाने वाला होली का निराला त्यौहार आ गया है। खुशबू से महकती मेवों भरी गुंजिया की थाली के सौंधेपन से सब का मन ललचाया है और बादाम युक्त केसरिया ठंडाई की ठंडक सबके मन को भाई है। सिलबट्टे पर पिसती भांग कहां पीछे रहने वाली है उसने भी अपने पहलू खोले हैं। इस ठनक भरे पर्व का अंदाज अनोखा है और सर-सर-सर करती पिचकारी ने सबको स्नेह के रंग से भिगो दियाहै। मेलजोल की रोली ने होली को एक नया विश्वास दिलाया है और इस बात की पुष्टि की है कि भाईचारे के गुलाल से हम मिलजुल कर होली खेले।

स्नेहा रूपी पिचकारी सदा जीतती रही है और इस कारण घृणा, द्वेष, चापलूसी, मक्कारी के रूप में आई हर बात टिक नहीं पाई है। सहज एकता की मिठास से हमारी झोली भरी हुई है। उल्लास की मधुर भावना हमारे अंग में समोही हुई है।

कामना यही है की आपस की दूरी मिट जाए और जीवन हो सुखमय सुहावना, गीतों की रसधार बहे और हर मन में सद्भाव जगा दें। होलिका दहन में हम सब बुराइयों का दहन कर लेवें। फिर ना उठ पाए कुरीतियां ऐसा समां बंध जाए। यह रंग ही हम सब पर बरसाएं और सारी रंगों से बढ़कर प्रेम का रंग ही हम सब मिलकर खेले और इस रंग में रंग कर उसे पर दूसरा रंग न चढ़ने दे ऐसा संकल्प हम आज लें ताकि जीवन के सफर में सदा रंग बिरंगी खुशहाली बरसती रहे।  

- ड़ॉ. मंजु मुकेश चोपड़ा जी, पुणे (महाराष्ट्र)



          

 

Login to Leave Comment
Login
No Comments Found
;
MX Creativity
©2020, सभी अधिकार भारतीय परम्परा द्वारा आरक्षित हैं। MX Creativity के द्वारा संचालित है |