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अहंकार का अंधकार | व्यक्तित्व और समाज पर प्रभाव

अहंकार का अंधकार 

अहंकार एक ऐसी मानसिक प्रवृत्ति है, जो व्यक्ति को अपनी श्रेष्ठता का अनुभव कराती है और दूसरों से खुद को ऊँचा दिखाने के लिए उसे हर कदम पर प्रेरित करती है। यह ऐसा भाव है, जो किसी भी व्यक्ति को अपनी कमजोरी को छिपाने और अपनी छवि को बनाए रखने के लिए किसी भी हद तक जा सकता है। हालांकि, अहंकार का परिणाम न केवल व्यक्तिगत रूप से, बल्कि समाज में भी गहरे नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है। यह प्रवृत्ति व्यक्ति को अपने विवेक और नैतिकता से विमुख कर सकती है और उसे एक असंतुलित मानसिकता की ओर प्रवृत्त कर सकती है।

अहंकार का पहला और प्रमुख शस्त्र आक्रोश होता है। यह वह प्रवृत्ति है, जो व्यक्ति को अपने स्वामी, राजा या किसी भी उच्च स्थान पर बैठे व्यक्ति के खिलाफ बोलने से रोकता है। यदि हम गौर करें, तो यह आक्रोश चारण कवि की तरह होता है, जो कभी भी अपने स्वामी या राजा के दोषों को उजागर नहीं कर सकता। यह प्रवृत्ति उसी प्रकार है, जैसे एक अहंकारी व्यक्ति अपनी स्थिति को बनाए रखने के लिए किसी भी तरीके का सहारा लेता है, चाहे वह कुटनीति, धोखाधड़ी या किसी अन्य हथकंडे का प्रयोग हो।

अहंकार के कारण व्यक्ति में समानता की भावना और न्याय की अवधारणा कमजोर हो जाती है। ऐसे व्यक्ति के लिए अपने लाभ और अपने अहंकार को बचाने के अलावा किसी और चीज़ का कोई महत्व नहीं होता। वह अपने विवेक और नैतिकता की उपेक्षा करता है और धर्म, ईमान, मानवता जैसी बुनियादी मानवीय विशेषताओं को भी दांव पर लगा देता है, ताकि वह स्वयं को निर्दोष और श्रेष्ठ साबित कर सके। इससे समाज में असामाजिक व्यवहार और वैमनस्यता उत्पन्न हो सकती है, जो अंततः समाज के सामान्य जीवन को प्रभावित करती है।

अहंकार से ग्रस्त व्यक्ति की विशेषता यह होती है कि जब उसकी स्थिति कमजोर पड़ने लगती है, तो वह निराधार आरोपों का सहारा लेता है। वह तथ्यों और तर्कों को त्यागकर, सामने वाले पर ऐसे आरोप लगाता है जिनका उस स्थिति से कोई संबंध नहीं होता। इसका उद्देश्य सामने वाले को मौन करना और अपनी स्थिति को फिर से सुदृढ़ करना होता है। हालांकि, यह एक अस्थायी रणनीति होती है, जो व्यक्ति को तत्कालिक सफलता तो दिला सकती है, लेकिन यह दीर्घकालिक रूप से उसे मानसिक शांति और सम्मान नहीं देती।

आक्रोश और अहंकार की इस मानसिकता का प्रभाव केवल व्यक्तिगत जीवन तक सीमित नहीं होता है, बल्कि यह पूरे समाज पर प्रभाव डाल सकता है। अहंकार में लिप्त व्यक्ति न केवल अपने और दूसरों के रिश्तों में दरार डालता है, बल्कि समाज के लिए भी एक विकृत उदाहरण प्रस्तुत करता है। यह व्यक्ति के मानसिक और सामाजिक स्वास्थ्य को भी प्रभावित करता है। यदि कोई व्यक्ति अपने अहंकार के कारण बार-बार गलत निर्णय लेता है या समाज की भलाई की ओर कदम नहीं बढ़ाता, तो यह स्थिति समाज में अशांति और असंतुलन का कारण बन सकती है।

हमने अक्सर देखा है कि अहंकारी व्यक्ति, अपनी स्थिति को बनाए रखने के लिए सत्य और न्याय की उपेक्षा कर देता है। वह केवल अपने स्वार्थ और खुद को श्रेष्ठ दिखाने की कोशिश करता है। इसके परिणामस्वरूप, वह समाज में मानवाधिकारों और समाजवादी मूल्यों को नुकसान पहुँचाता है। इस प्रकार का अहंकार, जो दूसरों को नीचा दिखाने और स्वयं को ऊँचा रखने के लिए किसी भी हद तक जा सकता है, समाज में एक नकारात्मक प्रवृत्ति को जन्म देता है।

अहंकार से मिलने वाली तात्कालिक सफलता व्यक्ति को एक समय के लिए प्रोत्साहित कर सकती है, लेकिन यह केवल भ्रम होता है। व्यक्ति का अहंकार उसे संगत निर्णय लेने से रोकता है, जिससे उसे दीर्घकालिक मानसिक संतोष नहीं मिलता। इस प्रकार का अहंकार व्यक्ति को मानसिक असुरक्षा और अकेलेपन की ओर ले जा सकता है। इसके विपरीत, जब व्यक्ति आत्म-स्वीकृति और विनम्रता से काम करता है, तो वह न केवल अपने जीवन में मानसिक शांति प्राप्त करता है, बल्कि समाज में भी एक सकारात्मक उदाहरण प्रस्तुत करता है।

अंततः, यह स्पष्ट होता है कि अहंकार एक द्वार हो सकता है, जो व्यक्ति को समाज में अपने स्वार्थ को स्थापित करने की ओर प्रेरित करता है, लेकिन यह उस व्यक्ति को खुद के साथ और दूसरों के साथ सामंजस्यपूर्ण संबंध स्थापित करने में नाकामयाब करता है। 
अहंकार और आक्रोश की प्रवृत्तियाँ न केवल व्यक्ति के लिए हानिकारक हैं, बल्कि समाज के लिए भी खतरनाक हो सकती हैं। यदि समाज को सही दिशा में आगे बढ़ाना है, तो हमें अहंकार को नियंत्रित करने, आत्म-निरीक्षण करने और समाज के प्रति संवेदनशीलता बढ़ाने की आवश्यकता है। अतः अहंकार केवल एक मानसिक अवबोधन नहीं है, बल्कि यह व्यक्तित्व की उस विकृति को दर्शाता है, जो समाज के लिए हानिकारक साबित हो सकती है। इसके प्रभाव को समझकर और इसे नियंत्रित करके हम अपने और समाज के संबंधों को स्वस्थ और मजबूत बना सकते हैं। इसलिए, हमें अहंकार से उबरने के लिए आत्म-नियंत्रण, विनम्रता और समाज के प्रति जिम्मेदारी की भावना को विकसित करना होगा।

लेखक - सुशील कुमार जी, हबीबपुर बाबागंज बाराबंकी (उत्तर प्रदेश)

                                    

                                      

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