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डॉ. राधाकृष्णन: व्यक्तित्व और कृतित्व | शिक्षक दिवस विशेष लेख

डॉ० राधाकृष्णन - व्यक्तित्व और कृतित्व

ऐसा व्यक्तित्व जिन्होंने राष्ट्रपति के बजाय शिक्षक कहलाया जाना पसंद किया

डॉ० राधाकृष्णन जी का जन्म 5 सितम्बर 1888 को आन्ध्रप्रदेश राज्य के चित्तूर जिले के तिरुत्तणी नामक स्थान पर हुआ था। राधाकृष्णन जी की माता का नाम श्रीमती सीता झा व पिता का नाम सर्वपल्ली वीरा रामास्वामी था। राधाकृष्णन जी के माता-पिता धार्मिक प्रवृत्ति के थे। छः भाई-बहिनों में राधाकृष्णन दूसरे नम्बर के थे।

राधाकृष्णन जी की प्राथमिक शिक्षा लूथरन मिशन स्कूल में हुई। जहाँ उन्होंने 1896 में प्रवेश लिया। इसी स्कूल से उनकी माध्यमिक शिक्षा भी हुई। 1902 में उन्होंने मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण की। आगे की शिक्षा वेल्लोर के वूरहीज कॉलेज एवं मद्रास के क्रिश्चियन कॉलेज से हुई। 1906 में इन्होंने दर्शनशास्त्र से एम० ए० की परीक्षा पास की।

उस समय मद्रास के ब्राह्मण परिवारों में कम उम्र में ही विवाह कर दिया जाता था तो 1903 में 16 वर्ष की आयु में ही राधाकृष्णन जी का विवाह 10 वर्षीय सिवाकामू के साथ कर दिया गया। 1908 में वह पहली बार पुत्री के पिता बने। वे 5 पुत्रियों व एक पुत्र के पिता बने।

दर्शन शास्त्र से परास्नातक करने के बाद वे 1909 में रेजिडेन्सी कॉलेज मद्रास में दर्शन शास्त्र के व्याख्याता बने। उन्होंने यहाँ 1916 तक पढ़ाया। 1916 से 1921 तक मैसूर विश्वविद्यालय में फिर 1921 से 1931 तक कलकत्ता विश्वविद्यालय में किंग जार्ज प्रोफेसर रहे। इस बीच मैनचेस्टर कॉलेज ऑक्सफोर्ड में तुलनात्मक धर्म के अप्टन लेक्चरर भी रहे और वहाँ 1929 से 1930 तक प्रसिद्ध हिब्बर्ट लेक्चर्स दिये। 1929 में उन्हें व्याख्यान देने के लिए मानचेस्टर विश्वविद्यालय में आमन्त्रित किया गया। दर्शन विषय पर उनकी पकड़ के कारण वे 1925 से 1937 तक भारतीय दर्शन परिषद की कार्यकारिणी समिति में स्थान दिया गया। 1937 से 1941 तक कलकत्ता विश्वविद्यालय के अन्तर्गत आने वाले जार्ज पंचम कॉलेज के प्रोफेसर के रूप में कार्य किया। अनेक वर्षों तक वे भारतीय पी०ई०एन० के अध्यक्ष के साथ अन्तरराष्ट्रीय पी०ई०एन० के उपाध्यक्ष रहे।

 



           



 

1931 में आन्ध्र विश्वविद्यालय, वाल्टेयर (आन्ध्रप्रदेश) के उप कुलपति बने और 1936 तक इस पद पर रहे। 1939 में वे बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के उपकुलपति बनाये गये, इस पद पर वे 1948 तक नियुक्त रहे। 1936 में पुनः उनकी नियुक्ति आक्सफोर्ड में स्पाल्डिंग प्रोफेसर ऑफ ईस्टर्न रिलिजन्स एंड एथिक्स के तौर पर हुई। इस पद पर वे 1936 से 1952 तक रहे।

डॉ० राधाकृष्णन जी की विद्वता के कारण 1946 से 1950 तक वे यूनेस्को में भारतीय प्रतिनिधि मंडल के नेता नियुक्त रहे। 1948 में देश में उच्च शिक्षा की स्थिति की जाँच के लिए उनकी अध्यक्षता में एक आयोग गठित किया गया। 1952 में उन्होंने यूनेस्को में भारतीय प्रतिनिधि मंडल की अध्यक्षता की। 1949 से 1952 तक सोवियत रूस में भारत के राजदूत रहे। 1953 में वे दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलपति बनाये गये तथा 1962 तक रहे। 13 मई 1952 से 12 मई 1962 तक भारत के पहले उपराष्ट्रपति तथा 13 मई 1962 से 13 मई 1967 तक भारत के दूसरे राष्ट्रपति रहे। 87 वर्ष की आयु में भारत के इस उच्च प्रतिभा सम्पन्न सितारे का देहांत 17 अप्रैल 1975 को हुआ।

डॉ० राधाकृष्णन जी अपनी विद्वता के कारण देश ही नहीं बल्कि विदेशों के विभिन्न विश्वविद्यालयों के अतिथि नियुक्त रहे। विश्व भर के अनेक विश्वविद्यालयों ने उन्हें मानद डाक्टरेट से सम्मानित किया। 1931 में ब्रिटिश साम्राज्य द्वारा सर की उपाधि दी गई। इग्लैंड की महारानी ने उन्हें आर्डर ऑफ मेरिट सम्मान देकर सम्मानित किया। जर्मनी ने गोयटे प्लाकेट सम्मान देकर उनकी विद्वता को नमन किया। इसके अलावा पुर ला मेरीते, मास्टर ऑफ विज्डम सम्मान भी उन्हें प्राप्त हुये। अमेरिका सरकार ने 1975 में उन्हें मरणोपरांत टैम्पलटन पुरस्कार से सम्मानित किया। 1954 में देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारतरत्न प्रदान कर देश ने भी उनकी विद्वता व कार्यों के लिए उन्हें नमन किया। 24 अप्रैल 1975 को लम्बी बीमारी के बाद डॉ० राधाकृष्णन जी का देहांत हो गया।

1962 में जब डॉ० राधाकृष्णन राष्ट्रपति बन गये थे, तो उनके कुछ पूर्व छात्र राष्ट्रपति के रूप में उनका जन्मदिन मनाना चाहते थे। उन छात्रों ने डॉ० राधाकृष्णन जी से उनका जन्मदिन मनाने की अनुमति माँगी।

इस पर डॉ० राधाकृष्णन ने कहा कि मेरे जन्मदिन को अलग तरीके से मनाने के बजाय, यदि 5 सितंबर को शिक्षकों द्वारा किए गए शिक्षा के क्षेत्र में कार्य, समर्पण और उनकी लगन-मेहनत को सम्मानित करते हुए मनाएं तो मुझे और अधिक ख़ुशी होगी और गर्व होगा। डॉ० राधाकृष्णन ने उन छात्रों से कहा कि मैं राष्ट्रपति के बजाय एक शिक्षक कहलाना पसंद करूँगा। बस तभी 5 सितम्बर 1962 से यह दिन शिक्षक दिवस के रूप में प्रसिद्ध हो गया।

डॉ० राधाकृष्णन ने इस दिन को देश के सभी शिक्षकों को समर्पित करते हुए कहा कि शिक्षक देश का निर्माता है। अतः यह दिन शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाय तो बेहतर होगा।

 



           



 

डॉ० राधाकृष्णन ने दर्शन, धर्म, न्याय, शासन व्यवस्था, शिक्षा व्यवस्था पर अनेक पुस्तकों और ग्रन्थों की रचना की, जिनमें से एथिक्स ऑफ वेदांत (1908), रविन्द्र नाथ ठाकुर का दर्शन (1918), कल्कि (1919), समकालीन दर्शन में धर्म का शासन (1920), भारतीय दर्शन खण्ड-1 (1923 व खण्ड-2 (1927)), जीवन का आदर्शवादी दृष्टिकोण (1932), भारतीय धर्म और पश्चिमी विचार (1939), भगवत गीता का अनुवाद (1948), प्रमुख उपनिषदों का अनुवाद (1953), ब्रह्मसूत्र (1960), धम्मपद का अनुवाद, धर्म और समाज आदि आपके प्रमुख ग्रंथ हैं। विशेषता की बात यह है कि अधिकांश ग्रंथ अंग्रेजी में हैं और लंदन के जार्ज एलेन एंड अन्विन से प्रकाशित हुये हैं।

डॉ० राधाकृष्णन आरम्भ में रामानुजाचार्य के मत से प्रभावित थे। बाद में वे आदिशंकराचार्य के अद्वैत दर्शन से प्रभावित दिखाई देते हैं। उनका सबसे बड़ा कार्य भारतीय दर्शन को अंग्रेजी भाषी लोगों तक सहज, सरल व सुन्दर ढंग से प्रेषित करना था। उनके ग्रंथों को पढ़ने के बाद कई अंग्रेजी भाषी लोग भारत की सभ्यता और संस्कृति को गहराई से समझ कर भारतीय दर्शन के अनुयायी बने।

डॉ० राधाकृष्णन जी के पुत्र डॉ० एस गोपाल ने 1989 में उनकी जीवनी प्रकाशित की।

(लेखक-उत्तराखंड के वरिष्ठ शिक्षक के साथ ही शैलेश मटियानी राज्य शिक्षक सम्मान व साराभाई टीचर साइन्टिस्ट नेशनल अवार्ड से सम्मानित शिक्षक तथा साहित्यकार हैं।)

- हेमंत चौकियाल जी, रूद्रप्रयाग, उत्तराखंड



           



 

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