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दीपावली में स्वदेशी चेतना और आत्मनिर्भर भारत का महत्व | वोकल फॉर लोकल एवं पंचपरिवर्तन

दीपावली में स्वदेशी चेतना और आत्मनिर्भर भारत

दीपावली भारतीय संस्कृति का वह उज्ज्वल पर्व है, जिसमें प्रकाश केवल घरों के आँगन में नहीं उतरता, बल्कि मनुष्य के भीतर भी आशा, सद्भाव, विवेक और नवचेतना का दीप जलाता है। यह पर्व अंधकार पर प्रकाश, अज्ञान पर ज्ञान, निराशा पर आशा और असत्य पर सत्य की विजय का सांस्कृतिक प्रतीक है। दीपावली का अर्थ केवल विद्युत झालरों, आकर्षक सजावट और बाजार में बढ़ती खरीदारी तक सीमित कर देना उसके व्यापक सांस्कृतिक संदेश को छोटा कर देना होगा। दीपावली वास्तव में हमारी लोकपरंपराओं, हस्तशिल्प, ग्राम्य अर्थव्यवस्था, पर्यावरणीय चेतना और स्वदेशी भावना को पुनर्जीवित करने का भी अवसर है।

जब दीपावली पर किसी कुम्हार के हाथों निर्मित मिट्टी का दीपक हमारे घर में प्रकाश फैलाता है, तब वह केवल मिट्टी का एक पात्र नहीं रहता, अपितु उसमें भारतीय श्रम, कौशल, परम्परा, प्रकृति और आत्मनिर्भरता का प्रकाश समाहित हो जाता है। एक मिट्टी का दीया खरीदना उस कारीगर के श्रम का सम्मान करना है, जिसकी पीढ़ियाँ मिट्टी को आकार देकर भारतीय जीवन में सौंदर्य और मंगल का संचार करती रही हैं। इसलिए ‘मिट्टी का दीया’ स्वदेशी चेतना का अत्यंत सुंदर और सजीव प्रतीक है।

दीपावली : प्रकाश से लोकजीवन तक

दीपावली की परंपरा भारतीय समाज में अत्यंत प्राचीन है। भारतीय संस्कृति में ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’ का मंगलमय संदेश वैश्विक चेतना जागृति का मूलमंत्र है। इसमें समस्त जनमानस को अंधकार से प्रकाश की ओर अर्थात अज्ञान से ज्ञान की ओर ले जाने का सद्प्रयास निहित है। अलग-अलग क्षेत्रों में इसके धार्मिक और सांस्कृतिक रूप भिन्न दिखाई देते हैं, किंतु दीप प्रज्ज्वलन की परंपरा लगभग सर्वत्र प्रकाश और मंगल की अभिव्यक्ति है। घर के द्वार पर जलता दीप अतिथि-सत्कार, समृद्धि और शुभता का प्रतीक माना गया।

ग्रामीण समाज में दीपक स्थानीय संसाधनों और स्थानीय श्रम से तैयार होता था। मिट्टी स्थानीय थी, मिट्टी का कलाकार स्थानीय था और तेल या घी भी प्रायः स्थानीय अर्थव्यवस्था का हिस्सा था। इस प्रकार दीपावली की अर्थव्यवस्था मूलतः समुदाय आधारित थी।

आज परिस्थितियाँ बदल गई हैं। बाजार में अनेक प्रकार की सजावटी वस्तुएँ उपलब्ध हैं। बिजली की झालरों और आधुनिक सजावट ने दीपावली की सुंदरता को नए आयाम दिए हैं, परंतु इनके बीच मिट्टी के पारंपरिक दीपों का महत्व कम नहीं हुआ है। बल्कि आज जब आत्मनिर्भरता, स्थानीय उत्पादन और पर्यावरण संरक्षण की चर्चा बढ़ रही है, तब मिट्टी का दीया पहले से अधिक प्रासंगिक दिखाई देता है।

 



                 



 

मिट्टी का दीया : स्वदेशी का उजला प्रतीक

स्वदेशी का अर्थ केवल विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार नहीं है। स्वदेशी का व्यापक अर्थ है—अपने देश की मिट्टी, श्रम, प्रतिभा, संसाधनों, परंपराओं और उत्पादन-क्षमता पर विश्वास करना। स्वदेशी वह भावना है जो कहती है कि जहाँ संभव हो, स्थानीय उत्पादों को प्राथमिकता देकर स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूत किया जाए।

मिट्टी का दीया इसी भावना का सहज प्रतीक है। यह स्थानीय कुम्भकार के हाथों बनता है, स्थानीय मिट्टी से आकार पाता है और हमारे पारंपरिक शिल्प को जीवित रखता है। इसके पीछे किसी बड़े कारखाने की मशीनरी से अधिक एक परिवार की मेहनत और पीढ़ियों का अनुभव होता है।

दीपावली के अवसर पर यदि हम सजावट के लिए स्थानीय कारीगरों द्वारा निर्मित दीये, कलात्मक दीपदान, मिट्टी की मूर्तियाँ, हस्तनिर्मित सजावटी वस्तुएँ और स्थानीय शिल्प खरीदते हैं, तो हमारा खर्च सीधे छोटे उत्पादकों और कारीगरों तक पहुँचता है। इस छोटे-से निर्णय का प्रभाव व्यापक हो सकता है।

कारीगर के घर का दीपक

हम प्रायः दीपावली में अपने घर को आलोकित करने के लिए अनेक दीप खरीदते हैं, लेकिन यह भूल जाते हैं कि उन दीपों को बनाने वाले कारीगर के घर में भी प्रकाश की आवश्यकता है। उनके परिवारों के लिए दीपावली केवल धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि आय का महत्वपूर्ण अवसर भी होती है। वे महीनों पहले से मिट्टी तैयार करने, दीप बनाने, सुखाने और पकाने में जुट जाते हैं।

किसी कारीगर से सीधे दीये खरीदना उसके उत्पाद की कीमत चुकाना भर नहीं है; यह उसके कौशल के प्रति सम्मान है। उचित मूल्य देना, मोलभाव में अत्यधिक कठोरता न करना और स्थानीय हस्तशिल्प को प्राथमिकता देना सामाजिक उत्तरदायित्व का हिस्सा है।

भारत की आत्मनिर्भरता केवल बड़े उद्योगों से नहीं बनेगी। वह तब मजबूत होगी जब छोटे दुकानदार, किसान, बुनकर, मृदा कलाकार, काष्ठकार, शिल्पकार, महिला उद्यमी और स्थानीय उत्पादक भी आर्थिक रूप से सशक्त होंगे। आत्मनिर्भर भारत की वास्तविक नींव इसी व्यापक आर्थिक सहभागिता में है।

 



                 



 

पंचपरिवर्तन अवधारणा के अनुरूप है दीप पर्व

समकालीन भारतीय सामाजिक चिंतन में ‘पंचपरिवर्तन’ की अवधारणा महत्वपूर्ण मानी जाती है। इसमें सामाजिक समरसता, कुटुंब प्रबोधन, पर्यावरण संरक्षण, स्वदेशी तथा नागरिक कर्तव्य जैसे पाँच परिवर्तनकारी आयामों पर बल दिया गया है। इन पाँचों को दीपावली के संदर्भ में देखें तो यह पर्व व्यक्तिगत उत्सव से आगे बढ़कर इसमें पंचपरिवर्तन स्वरूप दृष्टिगोचर होता है।

1. सामाजिक समरसता

दीपावली का प्रकाश किसी एक वर्ग, जाति या समुदाय के लिए नहीं होता। दीप का स्वभाव ही है कि वह भेदभाव किए बिना प्रकाश देता है। यही सामाजिक समरसता का संदेश है।

दीपावली हमें यह सिखा सकती है कि समाज का कोई भी श्रम छोटा नहीं होता। जिस हाथ ने दीप बनाया है, वही हाथ हमारे घर के उत्सव को पूर्ण करता है।

2. कुटुंब प्रबोधन

दीपावली कुटुंब प्रबोधन का बहुत उपयुक्त अवसर है। यह पर्व घर-परिवार के सभी लोग मिलकर मनाते हैं। इसमें परिवार के बच्चों को यह बताया जा सकता है कि मिट्टी का दीप कैसे बनता है, कुम्हार का जीवन कैसा होता है और स्थानीय वस्तु खरीदने से समाज को क्या लाभ होता है।

3. पर्यावरण संरक्षण

दीपावली का त्योहार प्रकृति से जुड़ा हुआ अनुष्ठान है। इस पर्व पर घर, बाहर और आसपास की साफ-सफाई की जाती है। इससे वातावरण स्वच्छ होता है। मिट्टी के पारंपरिक दीये मिट्टी से बने होते हैं, जो उपयोग के बाद आसानी से पुनः मिट्टी में मिल जाते हैं। दीयों में उपयोग होने वाला घी-तेल, बाती, पूजा का सामान, मिठाई, लाई, खील, चूरा, बताशे घर या पास-पड़ोस में ही जुटा लिए जाते हैं। दीयों के धुएँ से प्रदूषण नहीं होता। बिजली के कम प्रयोग से ऊर्जा की बचत होती है। हरित पटाखों के प्रयोग से पर्यावरण को क्षति नहीं पहुँचती।

कम प्रदूषण, कम अपशिष्ट और अधिक स्थानीय उत्पाद से आधुनिक दीपावली प्रकृति हितैषी हो जाती है।

4. स्वदेशी चेतना

स्वदेशी का आयाम दीपावली से सीधे जुड़ता है। दीपावली में जब हम स्थानीय कारीगरों, हस्तशिल्पियों और छोटे उद्यमियों से खरीदारी करते हैं, तो स्थानीय उत्पादन-चक्र को गति मिलती है।

स्वदेशी का अर्थ है—भारतीय उत्पादों की गुणवत्ता, नवाचार और प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता को बढ़ाना। ‘स्थानीय के लिए मुखर’ होने के उद्देश्य से हम अच्छे स्थानीय उत्पादों को पहचानें, उनका उपयोग करें और उन्हें व्यापक बाजार तक पहुँचाने में सहयोग दें।

5. नागरिक कर्तव्य

स्वच्छता, पर्यावरण-सुरक्षा, यातायात अनुशासन, सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा, जरूरतमंदों की सहायता और जिम्मेदार उपभोग—ये सभी नागरिक कर्तव्यों का हिस्सा हैं। दीपावली के अवसर पर घर की सफाई के साथ यदि हम अपने आसपास के सार्वजनिक स्थानों को भी स्वच्छ रखने का संकल्प लें, तो नागरिक कर्तव्यों का उद्देश्य पूर्ण होगा।

 



                 



 

इस प्रकार पंचपरिवर्तन दीपावली को केवल उत्सव न रहने देकर उसे सामाजिक परिवर्तन का माध्यम बना सकता है।

दीपावली पर्व का आत्मनिर्भर भारत अभियान में योगदान

आत्मनिर्भर भारत का आशय ऐसी सक्षम अर्थव्यवस्था से है जो अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के साथ विश्व के लिए भी गुणवत्तापूर्ण उत्पाद और सेवाएँ उपलब्ध करा सके। इसके लिए स्थानीय उत्पादन, कौशल विकास, नवाचार, उद्यमिता और उपभोक्ता की जागरूकता आवश्यक है।

दीपावली का बाजार इस दिशा में महत्वपूर्ण अवसर प्रस्तुत करता है। लाखों परिवार इस पर्व पर वस्त्र, मिठाइयाँ, सजावटी वस्तुएँ, उपहार और पूजा-सामग्री खरीदते हैं। यदि इस खरीदारी का एक बड़ा हिस्सा स्थानीय उत्पादकों तक पहुँचे तो इसका प्रभाव केवल एक परिवार तक सीमित नहीं रहता। इससे स्थानीय दुकानदार की आय बढ़ती है, उसके परिवार की शिक्षा और आवश्यकताओं में सहायता मिलती है, स्थानीय बाजार सक्रिय होता है और परंपरागत शिल्प को भविष्य मिलता है। इसके लिए हमें विदेशी वस्तुओं की खरीदारी का बहिष्कार करना होगा, इससे स्थानीय अर्थव्यवस्था सुदृढ़ होगी।

हमें ‘वोकल फॉर लोकल’ की भावना को दीपावली के सांस्कृतिक संदर्भ में समझना होगा। स्थानीय उत्पाद को चुनना केवल आर्थिक निर्णय नहीं, बल्कि सामाजिक भागीदारी भी है।

स्थानीय उत्पादों को आधुनिक बोध के अनुकूल बनाना आवश्यक

दीपावली पर मिट्टी के पाँच दीये खरीदना पर्याप्त नहीं। आवश्यकता इस बात की है कि पारंपरिक शिल्प को आधुनिक डिजाइन, बेहतर पैकेजिंग, डिजिटल बाजार, प्रशिक्षण, वित्तीय सहायता और नए उपभोक्ता वर्गों से जोड़ा जाए। यदि मिट्टी के दीपों को आधुनिक सौंदर्य-बोध के अनुरूप विकसित किया जाए और उन्हें देश-विदेश के बाजार तक पहुँचाया जाए, तो पारंपरिक कारीगरी, रोजगार और उद्यमिता का आधुनिक माध्यम बन सकती है।

इस संदर्भ में सरकार, स्वयंसेवी संस्थाओं, शैक्षणिक संस्थानों, डिजाइनरों, ई-कॉमर्स मंचों और सामान्य उपभोक्ताओं—सभी की भूमिका है।

दीपावली पर्व पर लें कुछ संकल्प

इस दीपावली हम कुछ छोटे लेकिन सार्थक संकल्प ले सकते हैं—

  • स्थानीय कारीगरों से दीये और मिट्टी के खिलौने खरीदें, उन्हें उचित मूल्य दें।
  • बड़ी दुकानों और मॉल से वह सामग्री न खरीदें, जो पास-पड़ोस की छोटी दुकानों या बाजारों में मिल रही हो।
  • स्थानीय हस्तशिल्प को उपहार में प्राथमिकता दें।
  • अनावश्यक प्लास्टिक सजावट कम करें, बिजली की लंबी झालरों का उपयोग न करें।
  • पर्यावरण के प्रति संवेदनशील रहें। अधिक शोर वाले पटाखे न छुड़ाएँ। केवल हरित पटाखे ही प्रयोग करें।
  • बच्चों को स्थानीय शिल्प की कहानी सुनाएँ तथा मूर्तिकारों, शिल्पकारों और काष्ठकारों के उत्पादों से परिचित कराएँ तथा उन्हें खरीदें।
  • दीपावली के नाम पर व्यर्थ के दिखावे में अपव्यय न करें, अनावश्यक शोर से किसी बीमार या पशु-पक्षी को कष्ट न पहुँचाएँ।
  • किसी वृद्धाश्रम, गौशाला या चिकित्सालय में जाकर दीप जलाएँ, कुछ धन दान करें एवं किसी निर्धन के अंधेरे घर में उजाला करने का शुभ संकल्प लें।

 



                 



 

निष्कर्ष

दीपावली का दीपक बहुत छोटा होता है, किंतु उसका संदेश है बहुत बड़ा। मिट्टी का एक साधारण-सा दीया हमें प्रकृति, श्रम, संस्कृति, अर्थव्यवस्था और आत्मनिर्भरता के बीच संबंध समझा सकता है। वह बताता है कि प्रकाश तभी सार्थक है, जब वह हमारे आसपास के जीवन को भी प्रकाशित करे।

पंचपरिवर्तन की दृष्टि से दीपावली हमें—समाज, कुटुंब, पर्यावरण, स्वदेशी चेतना और नागरिक कर्तव्य—इन पाँचों आयामों से जोड़ने का अवसर देती है। यदि हमारी खरीदारी किसी स्थानीय परिवार के रोजगार को मजबूत करे और यदि हमारा उत्सव प्रकृति के प्रति संवेदनशील बने, तभी दीपावली का प्रकाश वास्तव में व्यापक अर्थ प्राप्त करेगा।

जब करोड़ों घरों में ऐसे दीप जलेंगे और उनके साथ करोड़ों भारतीय कारीगरों के जीवन में भी आशा का प्रकाश पहुँचेगा, तभी दीपावली का सच्चा अर्थ साकार होगा। यही प्रकाश स्वदेशी का प्रकाश है, यही आत्मनिर्भरता की ज्योति है और यही भारत के उज्ज्वल भविष्य का आधार भी।

 



                 



 

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