Bhartiya Parmapara

दक्षिणेश्वर काली मंदिर: आस्था, श्रद्धा और आध्यात्मिक शक्ति की कहानी

विश्वास, श्रद्धा और शक्ति की जीवंत स्थली : दक्षिणेश्वर काली मंदिर 

मैं यह जानती थी कि दक्षिणेश्वर काली मन्दिर एक आध्यात्मिक व ऐतिहासिक महत्त्व वाला प्रसिद्ध काली मन्दिर है, साथ ही यह कोलकाता का एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक और धार्मिक केंद्र भी है। यह मन्दिर दार्शनिक व धर्मगुरु, स्वामी रामकृष्ण परमहंस की कर्मभूमि भी रहा है, जहाँ उन्हें काली माँ के साक्षात दर्शन हुए थे। मैंने कभी कल्पना भी नहीं की थी कि मैं इस पवित्र स्थान के दर्शन करूँगी। इस कोलकाता यात्रा की योजना बनाते हुए और यहाँ आकर भी हमारे मन में इसका स्मरण नहीं था, पर कहते हैं न कि सौभाग्य के सौ द्वार होते हैं।

आज हमारा भाग्य प्रबल था, इसीलिए हम तेज गर्मी की उपेक्षा करके 3.15 बजे टैक्सी से दक्षिणेश्वर के लिए रवाना हो गए क्योंकि मंदिर के खुलने का समय प्रातःकाल 5.30 से 10.30 तक और सांध्यकाल में 4.30 से 7.30 तक है। हमें पहुँचने में लगभग 1.30 घंटे का समय लगेगा। सड़क के दोनों ओर फूलों से लदे वृक्ष हवा के संग नृत्य कर रहे थे। हम अनुभव कर रहे थे कि ग्रीष्मकाल के आगमन के साथ ही प्रकृति के सौंदर्य में एक नया उत्कर्ष आ जाता है। यह समय सिर्फ गर्मी की चरम सीमा पर पहुंचने का संकेत ही नहीं देता है, बल्कि प्रकृति की विविधता और समृद्धि को भी उजागर करता है। ग्रीष्म के आतप में तपकर प्रकृति के विविध रंग समृद्ध हो जाते हैं, निखर उठते हैं। पलाश के लाल फूल, गुलमोहर के  लाल और नारंगी तथा अमलतास के सुन्दर-सुन्दर पीले झूमर की शोभा देखते हुए ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे प्रकृति सौंदर्य का उत्सव मना रही हो। फूलों का सौंदर्य हमें भी मंत्रमुग्ध कर रहा था, हम गर्मी की प्रचंडता को बिसर गए थे। 

दक्षिणेश्वर काली मंदिर उत्तरी कोलकाता के बैरकपुर (दक्षिणेश्वर) में हुगली नदी के किनारे विवेकानंद सेतु के छोर पर स्थित है। इस मंदिर में माँ भवतारिणी की मूर्ति स्थापित है. इन्हें माँ काली का रुप माना जाता है। बहुत ही भव्य और सुंदर भवनों से शोभित यह मंदिर लगभग 25 एकड़ में फैला हुआ है। देश-विदेश से माँ काली के उपासक और स्वामी रामकृष्ण परमहंस तथा स्वामी विवेकानंद के शिष्य यहाँ उपासना तथा दर्शन करने आते हैं।  
हमारी गाड़ी नए कोलकाता की चमचमाती चौड़ी सड़कों, हावड़ा ब्रिज, आकर्षक ऊँची इमारतों और बाजारों को पार करते हुए अब व्यस्त शहर की भीड़, बाजार और अपेक्षाकृत संकरे रास्ते को पार करते हुए मंदिर से केवल १५ मिनट दूर थी। सूर्य की किरणें वातानुकूलन को परास्त करने वाली अपनी प्रचंडता को छोड़ चुकी थीं। अब उसकी रोशनी हमारे मन में ऊर्जा का संचार कर रही थी। गर्मी से परेशान हम रोज सूर्यास्त की प्रतीक्षा करते हैं पर आज लग रहा है कि सूर्यास्त देर से हो ताकि हम दक्षिणेश्वर मंदिर के शांति से दर्शन करके वेलूर मठ भी जा सकें।

दक्षिणेश्वर का भव्य और मनोहारी भवन जलती हुई जमीन पर हमारे पैरों में गति भर रहा था। अति विशाल, सजीला हरित और शांत परिसर हमारे मन में पवित्र भाव भरने लगा। परिसर में श्रद्धालुओं की संख्या देखकर लगा कि मंदिर में काफी भीड़ होगी ‌।

हम मुख्य दक्षिणेश्वर काली मंदिर की ओर बढ़े। भक्तजन धूप और गर्मी की परवाह किए बिना अनुशासित और शांत पंक्तिबद्ध खड़े थे - न कोई धक्का-मुक्की, न किसी तरह आगे बढ़ने की कुलबुलाहट। परिवेश का प्रभाव मन की सारी उद्विग्नता को शांत कर रहा था। कतार निरंतर बढ़ रही थी। हम जितना आगे बढ़ रहे थे, लाइन पीछे भी उतनी ही लंबी हो रही थी।सभी का मन भक्ति भावों से सराबोर था। मैं भी मन ही मन - "ॐ जयंती मंगला काली भद्रकाली कपालिनी दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोस्तुते।" का अनुकीर्तन कर रही थी। गर्भगृह के सम्मुख खड़ी मैं अति रोमांचित हो रही थी। अनुपम सौंदर्य, तेज और वैभव से दैदीप्यमान काली माँ की प्रतिमा ने अवाक् कर दिया। ऐसा प्रतीत हो रहा था देवी माँ की करुणा और दिव्यता चारों ओर बरस रही है। माता चाँदी से बनाए गए सहस्र पंखुड़ियों वाले कमल पर, शस्त्रों सहित खड़ी थीं, भगवान शिव के ऊपर उनका एक पैर था। पुष्पों से की गई अद्वितीय सज्जा प्रतिमा की श्रीवृद्धि के साथ ही मंदिर को पवित्र सुवास से भर रही थी।

खास बात यह थी कि यहाँ न पुजारी और न कोई व्यवस्थापक /स्वयंसेवक किसी को आगे बढ़ाने वाला नहीं था। सब स्वप्रेरणा से चालित था। हम बहुत ही शांति पूर्वक दर्शन-आराधन कर आनंद का अनुभव कर रहे थे। मंदिर में न कोई पंडित -पंडे का पूजा करवाने का आग्रह, हस्तक्षेप नहीं, बहुत ही उत्फुल्ल वातावरण। परिसर के चारों ओर ऊँचे-ऊँचे वृक्ष हवा से अठखेलियां करते झूम रहे थे।

हरीतिमा के अतिरिक्त यहाँ खास आकर्षण यह है कि इस मंदिर के पास पवित्र गंगा नदी जो कि बंगाल में हुगली नदी के नाम से जानी जाती है, बहती है।  
हम मंदिर के 12 गुंबद देखकर आनंदित हो रहे थे। इस विशाल मंदिर में भगवान शिव के बारह मंदिर स्थापित किए गए हैं। मुझे लगा कि ये १२ ज्योतिर्लिंग के प्रतीक हैं। पर वहाँ ऐसा कोई उल्लेख नहीं था। 

दक्षिणेश्वर काली मंदिर देखने में जितना मनोहारी है, इसका इतिहास भी उतना ही रुचिकर और रोमांचक है, यह हमने वहाँ एक भक्त से जाना। ये महोदय मंदिर के निकट ही निवास करते हैं और प्रतिदिन दोनों समय दर्शन और मंदिर की व्यवस्था में सहयोग करने आते हैं।

उन्होंने हमें बताया कि एक दन्तकथा के अनुसार इस मंदिर के निर्माण की प्रेरणा स्वयं माँ काली ने रानी रासमनी नाम की एक बहुत ही धनी अपनी भक्त को स्वप्न में प्रकट होकर दी थी। रानी रासमनी के मन में सभी तीर्थों के दर्शन करने का ख्याल आया। उन्होंने निश्चय किया कि वह अपनी तीर्थ यात्रा की शुरुआत वाराणसी से करेंगी और वहीं रहकर देवी का कुछ दिनों तक ध्यान करेंगी।   
उसी रात देवी ने उन्हें स्वप्न में आदेश दिया और कहा कि “वाराणसी जाने की कोई जरूरत नहीं है, तुम गंगा के किनारे मेरी प्रतिमा को स्थापित करो। एक सुंदर मंदिर का निर्माण करवाओ। मैं उस मंदिर की प्रतिमा में खुद प्रकट होकर श्रद्धालुओं की पूजा को स्वीकार करुंगी”।   
रानी ने माता के आदेश को शिरोधार्य करके सन् १८५४ में नवरत्न की तरह निर्मित 46 फुट चौड़े तथा 100 फुट ऊँचे इस शक्तिपीठ का निर्माण करवाया।

 

   

स्वामी रामकृष्ण परमहंस को माँ काली ने इसी मंदिर में साक्षात दर्शन दिए थे। रामकृष्ण परमहंस को विश्वास था कि कठोर सधाना से मां काली का साक्षात्कार किया जा सकता है। वे पूरी निष्ठा के साथ मां काली की पूजा-अर्चना किया करते थे। इनकी भक्ति को देखते हुए इन्हें दक्षिणेश्वर काली मंदिर का मुख्य पुजारी नियुक्त किया गया। रामकृष्ण परमहंस भूखे-प्यासे सिर्फ मां काली को निहारते रहते, मां काली के सामने रोते रहते, उनकी तड़फ वैसी ही थी जैसे कोई बालक अपनी मां से बिछुड़ गया हो। वे माता की मूर्ति को पकड़ कर यही कहते रहते थे कि वे उन्हें अपना असली स्वरूप दिखाएं, दर्शन दें। 

लम्बे समय तक अपनी माँ से दूर रहते हुए परमहंस बेहद निराश और हताश हो गए और एक दिन काली माँ के चरणों में बैठकर खड्ग से अपना सिर काटने के लिए उद्यत थे कि स्वयं मां काली ने उनका हाथ पकड़ उन्हें रोक दिया। उस दिन के बाद से जब तक वे जीवित रहे तब तक मां काली उनकी माता और सखा के तौर पर उनके साथ रहीं।

मेरी दृष्टि में इस मन्दिर की प्रतिष्ठा और प्रसिद्धि का प्रमुख कारण है, स्वामी रामकृष्ण परमहंस से इसका जुड़ाव। यह पवित्र स्थल वर्षों तक स्वामी जी की साधना स्थली रहा है।

मंदिर के मुख्य प्रांगण के उत्तर पश्चिमी कोने में रामकृष्ण परमहंस का कक्ष आज भी उनकी ऐतिहासिक स्मृति के रूप में संरक्षित है।

मैंने इन महाशय से पूछा कि क्या यह मंदिर शक्तिपीठ है? ५१ शक्तिपीठों की सूची में तो इसका उल्लेख नहीं है? कोलकाता के कालीघाट का है। कहा जाता है कि वहाँ माता सती के दाँये पैर की अंगुलियाँ गिरी थी। ये महाशय मेरे प्रश्न से कुछ नाराज दिखे, किंतु शांति पूर्ण स्वर में बोले - “यहाँ माता जीवंत रूप में निवास करती हैं। स्वामी जी का जीवन इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है। यहाँ आने वाले श्रद्धालुओं पर माँ की असीम कृपा बरसती रहती है। आपको विश्वास करना चाहिए।”

वे भावविभोर हो कह रहे थे “इन मंदिरों में अनेक रहस्य भरे हैं। यहाँ कृष्ण मंदिर में खंडित मूर्ति पूजित है, जबकि सामान्य मान्यता के अनुसार खंडित मूर्ति रखना अशुभ माना जाता है …”।   
उन्होंने बताया कि स्थापना के समय सेवकों के हाथ से श्री कृष्ण की मूर्ति गिर गई थी और खंडित हो गई। इस पर घबराकर रानी ने सभी पंडितों की सभा बुलाई - पंडितों का मत था कि इस मूर्ति को विसर्जित करके दूसरी मूर्ति स्थापित की जाए। रानी स्वामी रामकृष्ण परमहंस पर अधिक विश्वास रखती थी तो उन्होंने उनसे उनका मत पूछा।

रामकृष्ण परमहंस ने उनसे जो कहा वह अद्भुत और मानवता का पाठ पढ़ाने वाला था। उनका कहना था कि “जब घर का कोई सदस्य विकलांग हो जाता है या माता-पिता में से किसी एक को चोट लग जाती है तो क्या उन्हें त्याग कर नया सदस्य लाया जाता? नहीं बल्कि उनकी सेवा की जाती है।” 

उनका समाज को अनुपम संदेश देता यह मत रानी को उचित लगा और उन्होंने कहा कि “यही मूर्ति स्थापित होगी और हम इसकी अच्छे से देख रेख करेंगे” इस तरह यहाँ समस्त मंदिरों में भाव जीवंत है।

भावों का एकमात्र आधार श्रद्धा और विश्वास है। हम उनके अखंड विश्वास और श्रद्धा को नमन करते हुए आगे बढ़ गए, हमें वेलूर मठ का आकर्षण खींच रहा था।

मैंने उन्हें बीच में ही टोकटे हुए पूछा कि फिर यहाँ ऐसा क्यों है?


उन्होंने बताया कि स्थापना के समय सेवकों के हाथ से श्री कृष्ण की मूर्ति गिर गई थी और खंडित हो गई। इस पर घबराकर रानी ने सभी पंडितों की सभा बुलाई - पंडितों का मत था कि इस मूर्ति को विसर्जित करके दूसरी मूर्ति स्थापित की जाए। रानी स्वामी रामकृष्ण परमहंस पर अधिक विश्वास रखती थी तो उन्होंने उनसे उनका मत पूछा।

रामकृष्ण परमहंस ने उनसे जो कहा वह अद्भुत और मानवता का पाठ पढ़ाने वाला था। उनका कहना था कि “जब घर का कोई सदस्य विकलांग हो जाता है या माता-पिता में से किसी एक को चोट लग जाती है तो क्या उन्हें त्याग कर नया सदस्य लाया जाता? नहीं बल्कि उनकी सेवा की जाती है।” 

उनका समाज को अनुपम संदेश देता यह मत रानी को उचित लगा और उन्होंने कहा कि “यही मूर्ति स्थापित होगी और हम इसकी अच्छे से देख रेख करेंगे” इस तरह यहाँ समस्त मंदिरों में भाव जीवंत है।

भावों का एकमात्र आधार श्रद्धा और विश्वास है। हम उनके अखंड विश्वास और श्रद्धा को नमन करते हुए आगे बढ़ गए, हमें वेलूर मठ का आकर्षण खींच रहा था।

                                     

                                       

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