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भोले बाबा का बटेश्वर धाम – जहां यमुना उल्टी बहती है और 108 शिव मंदिर हैं

भोले बाबा का धाम बटेश्वर - जहां यमुना नदी की धारा उल्टी बहती है 


भारत की संस्कृति विविधताओं एवं चमत्कारों से सजी-धजी है। ऐसा ही एक चमत्कारिक स्थान है बटेश्वर जो उत्तर प्रदेश के आगरा जिले में स्थित है। चमत्कार ऐसा कि यहां बटेश्वर से 4 किलोमीटर तक यमुना नदी उल्टी दिशा में बहती है। तथा यमुना मैया के किनारे भगवान शिव के 108 मंदिर हैं, शिव जी का ऐसा कोई भी रूप नहीं जो कि वहां विद्यमान ना हो। हां जहां तक नजर जाती है शिवजी के मंदिर ही नजर आते हैं।

भौगोलिक स्थिति-  
आगरा जिले में बाह तहसील स्थित है उस तहसील में जो आगरे की पूर्वी एवं अंतिम तहसील है। इस बाह तहसील से 10 कि.मी. दूर उत्तर में यमुना नदी के किनारे बाबा का धाम बटेश्वर है। यह आगरे से 70 कि.मी. है तथा यहां से शिकोहाबाद 14 कि.मी.।

ऐतिहासिक, धार्मिक एवं सांस्कृतिक महत्व-  
बटेश्वर एक पवित्र एवं गौरवशाली प्राचीन तीर्थ स्थान है। जो अपने पौराणिक तथा ऐतिहासिक महत्व के लिए प्रसिद्ध है। बटेश्वर धाम में सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग का इतिहास है। बटेश्वर के पास ही शौरीपुर है जो जैन समुदाय के तीर्थंकर भगवान नेमिनाथ जी की जन्मस्थली है। इसका उल्लेख लिंग पुराण, मत्स्य पुराण, नारद पुराण, शिव पुराण मैं भी दिया हुआ है कोटि रुप संहिता के अध्याय 2 के श्लोक 19 में इस तीर्थ की चर्चा है जो इस धाम की पौराणिकता दर्शाती है। भगवान श्री कृष्ण के पिता वासुदेव जी कि यह राजधानी थी, तथा कर्ण का जन्म भी शौरीपुर में ही हुआ था। आज जैन धर्म का शौरीपुर बहुत बड़ा तीर्थ स्थान बन गया है लाखों लोग यहां दर्शन करने आते हैं तथा शौरीपुर का विकास भी काफी हो गया है।

बटेश्वर में भदोरिया राजाओं का राज्य था, आज भी उनका महल बटेश्वर में खंडहर के रूप में विद्यमान है। शौरीपुर के रास्ते में माँ राज रानी का बहुत प्राचीन मंदिर है जो एक राजा शूरसेन की राजधानी भी शौरीपुर ऊंचे टीले पर स्थित है। मंदिर का रास्ता थोड़ा कठिन है दोनों तरफ बबूल के कटीले वृक्ष तथा कटीली झाड़ियां हैं। राजा शूरसेन की राजधानी शौरीपुर थी। जरासंध ने जब मथुरा पर आक्रमण किया तो यह नष्ट हो गया। बटेश्वर महत्व में लिखा है महाभारत युद्ध के समय बलभद्र विरक्त होकर इस स्थान पर विश करने आए थे।

एक किदबन्त के अनुसार कंस का मृत शरीर बहते हुए बटेश्वर में जहां ठहराव है वहां रुक गया था इसलिए उस किनारे का नाम कंस किनारा पड़ गया।

यमुना नदी की उल्टी धारा -  
राजा बदन सिंह जो उस समय वहां के राजा थे। अकबर सम्राट से मिलने गए, तथा बटेश्वर आने का निमंत्रण दिया तथा भूल से कह गए आगरा से बटेश्वर पहुंचने में यमुना पार नहीं करनी पड़ेगी, वापस आने पर भूल का आभास हुआ अकबर के सामने झूठा बनना पड़े इसलिए यमुना की धारा को पूर्व से पश्चिम की ओर मुडवाकर बटेश्वर के दूसरी ओर कर दिया तथा पक्के घाटों का निर्माण कराया।

 

   

निर्माण की कथा - 

राजा अकबर के समय भदोरिया राजा राज्य के करते थे महाराज भदावर तथा उनके मित्र राजा परमार की रानी गर्भवती हुई उन दोनों ने यह तय कर लिया हम एक दूसरे के यहां विवाह संबंध स्थापित करेंगे। यदि भदावर महाराज के लड़का हुआ और परमार के यहां लड़की तो दोनों संबंध मजबूत करेंगे। यदि परमार के यहां लड़का और भदावर महाराज के लड़की हुई तो भी एक दूसरे के यहां शादी करेंगे।

ऐसा विचित्र संयोग हुआ कि दोनों राजाओं के यहां कन्याएं पैदा हुई। किंतु बराबर राजा ने यह घोषित कर दिया मेरे यहां लड़का पैदा हुआ है तथा लड़के की तरह अपनी कन्या की परवरिश करने लगे। जब पर मारो ने शादी का दबाव डाला तो उन्होंने ढाल और तलवार भेजकर शादी करवा ली। पहले यह पता थी कि यदि राजा शादी करने नहीं आता तो वह अपनी ढाल और तलवार भेज कर उससे शादी कर सकता है। जब कन्या को यह मालूम पड़ा तो भगवान शिव जी की आराधना करने लगी बहुत कठिन तप कन्या ने किया। अंत में उसने दुखी होकर यमुना नदी में छलांग लगा ली।  
भगवान शंकर उसकी पूजा से बहुत प्रसन्न थे चमत्कार हुआ और वह लड़की लड़का बन कर यमुना से निकली। कहा जाता है इसी खुशी में राजा ने यमुना नदी के किनारे 108 मंदिर शिव जी के बनवाए जो अभी भी देखे जा सकते हैं। मुंशी प्रेमचंद जी ने भी अपनी कहानी में बटेश्वर का उल्लेख किया है। बटेश्वर का मेला पूरे भारतवर्ष में प्रसिद्ध है। मेला तीन चरणों में लगता है। पहले चरण में विभिन्न पशुओं का मेला लगता है देशभर से पशु बिक्री के लिए वहां आते हैं तथा खरीददार वहां से खरीद कर ले जाते हैं। ऐसा कोई भी पशु नहीं जो कि उस पशु मेले में न आता हो। उसके बाद कार्तिक मास की दूज को मेला बड़े बृहद रूप में दिखाई पड़ता है इस दिन मां गौरा और शंकर जी के मंदिर में श्रृंगार होता है इस मंदिर में भगवान शंकर और गोरा की बड़ी-बड़ी प्रतिमाएं स्थापित है और यह मंदिर बटेश्वर नाथ जी के मुख्य मंदिर के पास ही स्थित है। बहुत भव्य श्रृंगार किया जाता है। सुहागन मां गौरा को सुहाग सामग्री अर्पित करती हैं। उद्दीन आसपास के गांव के लाखों लोग दर्शन करने यहां आते हैं।

चमत्कारी जल-

शंकर जी का एक मंदिर मोटे बाबा का मंदिर कहलाता है। इस मंदिर में बहुत बड़ा शिवलिंग है। उस शिवलिंग के बारे में कहा जाता है दोनों हाथ शिवलिंग पर दोनों तरफ  
से लगाकर मिलाना जिसके हाथ मिल जाते हैं उसके सारे काम सिद्ध होते हैं। इसी मंदिर को "मस्से वाले बाबा का मंदिर" भी कहते हैं। पूरे शिवलिंग पर छोटे छोटे काले काले निशान हैं। इस शिवलिंग पर जल चढ़ाने के बाद जलहरी में जो जल आता है वह जल मस्सों के ऊपर लगाने से मस्से अपने आप समाप्त हो जाते हैं। दूर-दूर से लोग जलहरी का जल लेने आते हैं। ऐसा कहा भी जाता है कि व्यक्ति के मस्से समाप्त हो जाते हैं वह शिवलिंग पर अंकित हो जाते हैं इसलिए शिवलिंग पर काले-काले छोटे निशान हैं।

बटेश्वर की यमुना नदी का अपना महत्व है लाखों लोग कार्तिक मास की दूज और देव उत्थान एकादशी को स्नान कर पुण्य लाभ लेते हैं। बटेश्वर धाम पुरातत्व विभाग ने अपने अधीन कर लिया है। इसी कारण बटेश्वर का काफी विकास हुआ है। पक्की सड़कें रेलवे स्टेशन मंदिर का द्वार आज का निर्माण हो चुका है। बटेश्वर धाम पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेई जी की जन्म भूमि है। बटेश्वर में चारों तरफ टीले ही टीले है, इन्हीं टीलो के ऊपर लोग निवास करते हैं तथा अपनी मकान बनाते हैं, तथा बड़ी-बड़ी हवेलियां बनी है। जिनमें पहुंचने के लिए चढ़ाई करनी पड़ती है।

 

   

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