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अध्यात्म और विज्ञान का समन्वय: आज की आवश्यकता | भारतीय दृष्टि

अध्यात्म और विज्ञान का समन्वय: आज की आवश्यकता

भारत विज्ञान और अध्यात्म—दोनों क्षेत्रों में सदैव श्रेष्ठ रहा है और विश्व गुरु कहलाया है। आज वैज्ञानिक युग के बदलते संदर्भ में हमें अध्यात्म और विज्ञान की व्याख्या करते हुए दोनों के अंतःसूत्रों को पहचानना होगा और उन मूल्यों व परंपराओं को जन-जन तक पहुँचाना होगा, जिनमें हमारे आनंदमय और सुरक्षित भविष्य को प्राणवंत बनाने की शक्ति निहित है। हमारी गौरवमयी वैज्ञानिक-अध्यात्म परंपराओं से युवाओं को परिचित कराना और उन्हें इस दिशा में चिंतन हेतु प्रेरित करना ही हमारा पावन उद्देश्य है।

मानव के समक्ष प्रकृति अपने अनंत चमत्कारिक और रहस्यमय रूपों में सदा उपस्थित रही है—आकाश, पृथ्वी, अथाह जलराशि से भरे समुद्र, सूर्य, चंद्र, ग्रह-नक्षत्र, विविध वनस्पतियाँ, जीव-जंतु, ऋतु-चक्र तथा जीवन-मृत्यु। ये सभी मानव की जिज्ञासा और कौतूहल के केंद्र रहे हैं। प्राकृतिक घटनाओं ने उसे यह मानने के लिए प्रेरित किया कि इस भौतिक जगत के निर्माण और संचालन के पीछे कोई सर्वशक्तिमान अदृश्य शक्ति विद्यमान है, जिसका आभास तो होता है, पर जिसे आँखों से देखा नहीं जा सकता। प्रकृति के कण-कण में एक दिव्य नाद प्रवाहित है, पर हम उसे सुन नहीं पाते। इन्हीं जिज्ञासाओं से अध्यात्म का जन्म हुआ।

‘आत्म’ शब्द में ‘अधि’ उपसर्ग जुड़ने से अध्यात्म शब्द बना है। अतः अध्यात्म का अर्थ है—आत्म विषयक ज्ञान, अर्थात आत्मा का विज्ञान ही अध्यात्म है।

गीता के आठवें अध्याय में अर्जुन श्रीकृष्ण से पूछते हैं—ब्रह्म क्या है और अध्यात्म क्या है? श्रीभगवान उत्तर देते हैं—“अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते।” तिलक जी ने ‘गीता रहस्य’ में इसकी व्याख्या करते हुए कहा है कि जो कभी नष्ट न हो वही ब्रह्म है और जीवात्मा ही अध्यात्म है।

महर्षि व्यास के अनुसार विश्व में मनुष्य से श्रेष्ठ कुछ नहीं है और उसमें परम चेतना को उभारने वाली विद्या ही अध्यात्म है। अध्यात्म में धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—चारों पुरुषार्थ समाहित हैं, जिनका लक्ष्य जीवन को सुखी, समृद्ध और आनंदमय बनाते हुए पूर्णता प्रदान करना है। स्वामी विवेकानंद ने अध्यात्म को ब्रह्म-विचार, ज्ञान-तत्व और आत्मज्ञान कहा—आत्मा और परमात्मा को समझने की प्रक्रिया।

आज भ्रमवश हमने वैज्ञानिक प्रगति को ही मानव प्रगति का पर्याय मान लिया है, जिसके परिणाम भयावह भी हुए हैं। विज्ञान ने जीवन को सुविधाजनक और वैभवशाली तो बनाया, किंतु साथ ही मानव का स्वार्थ, अहंकार और अधिकार-बोध भी बढ़ा। विनाशकारी आयुधों की होड़ और विचारों से तेज़ दौड़ती तकनीक ने हमारे अस्तित्व पर प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए हैं।



       

 

जब किसी राष्ट्र की संस्कृति और परंपराएँ नई शक्तियों के सामने बौनी प्रतीत होने लगें, तो आत्मविश्लेषण आवश्यक हो जाता है। आज हमारा देश इसी संक्रमण और संकट के दौर से गुजर रहा है। इसका मूल कारण है—संस्कृति, परंपरा, संस्कार और साहित्य से विमुखता। इस स्थिति में एकमात्र मार्ग है—विज्ञान और अध्यात्म का संतुलित समन्वय

विज्ञान तर्क और प्रयोग पर आधारित है; वह किसी सत्य को अंतिम नहीं मानता। वहीं अध्यात्म अंतस का विज्ञान है—जो अनुभव, भावना और विश्वास के माध्यम से मानव की आंतरिक प्रक्रियाओं को समझता है। विज्ञान विश्लेषण करता है, अध्यात्म संश्लेषण। विज्ञान तर्क पर आधारित कला है, और अध्यात्म अनुभव पर आधारित विज्ञान।

मानव जीवन के दो पक्ष हैं—आंतरिक और बाह्य। अध्यात्म आंतरिक पक्ष को समृद्ध करता है—मानसिक शांति, धैर्य, संयम और आनंद प्रदान करता है; जबकि विज्ञान बाह्य जीवन को सुविधा और समृद्धि देता है। बिना आंतरिक संतुलन के बाह्य वैभव भी मानव को सुखी नहीं बना सकता।

यदि मानव को सम्यक और उदात्त जीवन की ओर अग्रसर करना है, तो अध्यात्म और विज्ञान की पारस्परिक पूरकता को समझना अनिवार्य है। अध्यात्म दृष्टि को परिष्कृत करता है, मन को शांति देता है और करुणा, सहनशीलता व चरित्र-बल विकसित करता है।

वस्तुतः विज्ञान और अध्यात्म—दोनों का उद्देश्य मानव जीवन को श्रेष्ठता की ओर ले जाना है। भारत ने सदैव सह-अस्तित्व का पोषण किया है—परा और अपरा विद्या दोनों को साथ लेकर। स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि आधुनिक विज्ञान वस्तुतः अध्यात्म भावना की ही अभिव्यक्ति है।



       

 

आज समय आ गया है कि विज्ञान भौतिक जगत से आगे बढ़कर चेतना जगत को भी समझे। जैसे पौराणिक काल में समुद्र मंथन से रत्न निकले, वैसे ही आज विज्ञान और अध्यात्म के समन्वित मंथन से मानव नई शक्तियाँ प्राप्त कर सकता है।

विश्व के महान विचारक भी स्वीकार कर रहे हैं कि विज्ञान और अध्यात्म के बीच बनी खाई को पाटना आवश्यक है। पदार्थ बिना चेतना के अंधा है और चेतना बिना पदार्थ के पंगु। दोनों के सहयोग से ही मानवता का मार्ग प्रशस्त हो सकता है।

आज विज्ञान, अध्यात्म और मानवता के समन्वय से एक नवीन ज्ञान का उदय हो रहा है—जिसे विवेकानंद जी ने दिव्य ज्ञान कहा। अध्यात्म धैर्य, संतोष, संयम और वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना को पुष्ट करता है।

अतः आवश्यक है कि हम अध्यात्म को विज्ञान के आलोक में और विज्ञान को अध्यात्म के साथ प्रस्तुत करें, ताकि विश्व शांति और मानव कल्याण का मार्ग प्रशस्त हो सके।

महाकवि जयशंकर प्रसाद ने ‘कामायनी’ में कहा है—  

जीवन का उद्देश्य नहीं है, 
शांत भवन टिक रहना। 
किंतु पहुँचना उस सीमा तक, 
जिसके आगे राह नहीं है। 



       

 

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