Bhartiya Parmapara

बेटी का महत्व – सोच के दायरे को तोड़ती एक प्रेरणादायक कहानी

परवरिश 


नौ माह से अपने मन में बेटे की ख्वाहिश पाल रही स्वधा जैसे ही लेबर रूम से बाहर आयी तो बेटी को देख उसका अश्रु बांध फूट पड़ा जमाना बदल गया पर आज भी सोच का दायरा संकुचित है यह देख उसकी मौसी मन मसोस कर रह गई।

वहीं अस्पताल में दूसरी और बधाइयां बांटी जा रही थी जश्न मनाया जा रहा था दोनों स्थितियों के वातावरण को देखकर मौसी के मन में कल्पनाओं ने अपना मंथन प्रारंभ कर दिया मानव भी कितना भ्रमित जीवन जी रहा है जहां जिंदगी में पल का भरोसा नहीं वहां वह बेटे के हो जाने से अपने सुनहरे भविष्य के ताने-बाने बुनने में मशगूल हो जाता है।

आज के दौर में बेटा हो या बेटी कोई विशेष फर्क नहीं पड़ता महत्त्वपूर्ण है तो वह है परवरिश क्यों की बीज जैसा बोया जाएगा फल वैसा ही मिलना है जिस बीज को अच्छे खाद पानी से सींचा जाता है खराब होने पर कीटनाशक डाला जाता है वह पेड़ अच्छे फल के साथ ही एक सुखद छांव भी देता है और जिस पेड़ की सही देखभाल नहीं होगी उससे मीठे फल प्राप्ति की कल्पना मात्र भ्रम है जिस तरह पौधों का स्वस्थ रहना बागवान के हाथ है वैसे ही बच्चों के भविष्य की बुनियाद को मजबूत करने में सर्वाधिक योगदान मां का होता है उनका भविष्य बनाने में कई बार उसे अपनी खुशियों को दांव पर लगाना पड़ता है, अपनी आदतें बदलनी पड़ती है लेकिन जब चारों ओर यह बच्चे अपने कीर्ति का परचम लहराते हैं, अपनी काबिलियत से सितारों की तरह यह हर क्षेत्र में चमकते हैं तो सर्वाधिक रोशनी मां को ही मिलती है।

मौसी स्वधा के पास बैठी सोच के समंदर में डूबी थी तभी डॉक्टर आयी और जांच करते हुए कहने लगी कल आपका चेकअप करने दूसरी डॉक्टर आएगी मुझे अपनी मम्मी को हैदराबाद चेकअप के लिए ले जाना होगा यह कह कर डॉक्टर तो चली गई लेकिन मौसी स्वधा से कहने लगी यह महिला केवल सफल डॉक्टर ही नहीं एक कुशल बेटी और जिम्मेदार गृहिणी भी है स्वधा का मातृत्व जाग उठा उसकी आंखों में बेटी के भविष्य को उज्जवल बनाने के सपने तैरने लगे।

 

 

                                    

                                      

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