Bhartiya Parmapara

2026: समय की देहरी पर जागरण का वर्ष | चेतना, समाज और राष्ट्र पर विचार

2026: समय की देहरी पर जागरण का वर्ष

नए वर्ष का आगमन अक्सर केवल एक क्षणिक उत्सव की तरह दिखता है, पर वास्तव में वह समय के गहरे प्रवाह में वह बिंदु है जहाँ बीता हुआ वर्ष अपनी थकान छोड़कर विलीन हो जाता है और नया वर्ष अपने अनाम भविष्य के साथ हमारे सम्मुख उपस्थित होता है। 2026 की देहरी पर खड़े होकर यह प्रश्न कि आगत वर्ष कैसा हो, केवल व्यक्तिगत नहीं रह जाता—वह हमारे राष्ट्रीय, सामाजिक और सामूहिक विवेक को भी छूता है।

कामना है कि यह वर्ष हमें स्वयं के भीतर लौटने का अवसर दे। मनुष्य अपनी ही गति, महत्वाकांक्षा और उपलब्धियों की परतों में इतना उलझ जाता है कि वह अपने मूल स्वरूप को भूलने लगता है। 2026 एक ऐसा शांतागार बने, जहाँ हम अपने अंतर्मन को सुन सकें—उन प्रश्नों को, जिन्हें हम वर्षों से टालते आए हैं; उन इच्छाओं को, जिन्हें हम परिस्थितियों के नाम पर दबाते रहे; और उन सच्चाइयों को, जिनसे सामना करना हमेशा कठिन लगता है। यह वर्ष हमें भीतर की धुंध को हटाकर स्वयं के प्रति ईमानदार होने का साहस दे।

नया वर्ष हमारे संबंधों के समीकरणों में भी एक नयी कोमलता लाए। आधुनिक जीवन, यद्यपि सुविधाओं से भरपूर है, पर संवादों की गुणवत्ता में कहीं न कहीं क्षरण आया है। 2026 ऐसा वर्ष हो जिसमें हम पुनः सीख सकें कि किसी मनुष्य से बात करना केवल शब्दों का प्रयोग नहीं, बल्कि एक हृदय का दूसरे हृदय तक पहुँचना है। हम अपने प्रियजनों के साथ ही नहीं, समाज में मिले अनजानों के साथ भी एक मनुष्य-से-मनुष्य संबंध स्थापित कर सकें—सम्मान, विनम्रता और उदारता के साथ।

परिवर्तन की आकांक्षा केवल व्यक्तिगत स्तर तक सीमित नहीं रहती; वह अनिवार्य रूप से समाज तक फैलती है। हमारे राष्ट्रीय परिदृश्य में आज विचारों, मान्यताओं और दृष्टिकोणों का एक व्यापक संवाद चल रहा है—कहीं तीखा, कहीं दार्शनिक, कहीं विसंगतियों से भरा। 2026 ऐसा वर्ष बने जिसमें यह संवाद संघर्ष नहीं, सहमति का कोई नया आधार खोज सके। हम मतभेदों को द्वेष में नहीं, विमर्श में परिवर्तित कर सकें। यह वर्ष हमें याद दिलाए कि राष्ट्र केवल भूगोल नहीं, बल्कि साझा स्मृतियों, मूल्यों और भविष्य की आकांक्षाओं का जीवित स्वरूप है।

हमारे सामाजिक ताने-बाने में संवेदना की पुनर्स्थापना अत्यावश्यक है। प्रतिस्पर्धा ने मनुष्यता के भीतर से करुणा के स्वरों को धीमा कर दिया है। आगत वर्ष एक ऐसा वर्ष हो जिसमें हम समाज के सबसे मौन समूहों की आवाज़ सुन सकें—उन स्त्रियों की, जिनकी क्षमताएँ अक्सर परिस्थितियों और पूर्वाग्रहों से दब जाती हैं; उन बच्चों की, जिनके सपनों को अवसर का आकाश अभी नहीं मिला; उन मजदूरों, किसानों और श्रमिकों की, जिनका श्रम हमारी सभ्यता का मूल आधार है; और उन बुजुर्गों की, जिनका अनुभव हमारे समय की सबसे बड़ी, पर सबसे उपेक्षित धरोहर है।



       

 

यह वर्ष हमें यह भी स्मरण कराए कि विकास केवल निर्माण, आँकड़ों और नयी संरचनाओं का नाम नहीं है; विकास वह है जिसमें मनुष्य स्वयं को सुरक्षित और सम्मानित महसूस करे। राष्ट्र तभी आगे बढ़ता है जब सामाजिक न्याय, समान अवसर और पारदर्शिता उसके विकास की मूलभूत शर्तें बनती हैं। यह वर्ष इन सिद्धांतों को केवल नीतियों में नहीं, बल्कि हमारे सामूहिक व्यवहार में स्थान दे।

कठिनाइयाँ आएँगी—राष्ट्रीय स्तर पर भी और व्यक्तिगत स्तर पर भी—पर हम उन कठिनाइयों को विघटन नहीं, सुदृढ़ता का अवसर समझ सकें। राष्ट्र और व्यक्ति, दोनों ही संघर्षों से गुजरकर अपनी क्षमता पहचानते हैं। इस वर्ष में यह परिपक्वता आए कि हम समस्याओं को शोर में नहीं डुबाएँ, बल्कि समाधान की ओर बढ़ने वाला मार्ग खोजें—संवाद से, धैर्य से और बुद्धिमत्ता से।

और इस सबके बीच प्रकृति—हमारी श्वास, हमारा पर्यावरण, हमारी धरोहर—हमारे राष्ट्रीय विवेक का अनिवार्य हिस्सा बने। यह वर्ष हमें याद दिलाए कि वृक्ष, नदियाँ, पहाड़, पवन और मिट्टी केवल दृश्य नहीं, बल्कि भविष्य का आधार हैं। हम मानव और प्रकृति के बीच वह संबंध पुनर्स्थापित करें जिसमें उपभोग नहीं, सह-अस्तित्व प्रधान हो।

अंततः यह वर्ष हमारे स्वप्नों के लिए भी एक आश्रय बने। राष्ट्र का भविष्य उसके नागरिकों के स्वप्नों से बनता है। जब एक कवि अपनी कविता लिखता है, एक किसान अपनी मिट्टी को सींचता है, एक वैज्ञानिक अपनी खोज में रत होता है, और एक शिक्षक अपने विद्यार्थियों को ज्ञान देता है—तभी राष्ट्र आगे बढ़ता है। सन् 2026 ऐसा वर्ष हो जिसमें हर मनुष्य अपने भीतर छिपे सृजन को पहचान सके और उसे दुनिया के सम्मुख लाने का साहस पा सके।

कामना है कि यह नया वर्ष केवल कैलेंडर का परिवर्तन नहीं, बल्कि चेतना का जागरण बने—ऐसा वर्ष जिसमें शब्द गौण हो जाएँ और मनुष्य अपनी शैली में, अपने कर्मों में, अपने दृष्टिकोण में नया अर्थ रच सके। ऐसा वर्ष जिसमें व्यक्तिगत और राष्ट्रीय दोनों यात्राएँ एक गहरे, शांत और अधिक मानवीय भविष्य की ओर कदम बढ़ाएँ। 2026 केवल आए नहीं—हमारी संवेदना, हमारी बुद्धि और हमारे सामूहिक भविष्य में उतर सके।



       

 

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