शिव अराधना
श्रावण मास में महादेव की आराधना -
"आदि अनादि अनंत अखंड
अभेद अखेद सुबेद बतावे
अलख अगोचर रूप महेश को
जोगी मुनि ध्यान न पावे
आगम निगम पुराण सबै
इतिहास सदा जिनके गुण गावे
बड़ भागी नर नारी सोई जो
सांब सदाशिव को नित ध्यावे"
श्रावण मास की शुरुआत के साथ-साथ मंदिरों में 'हर हर महादेव' के जयकारे और शंखों की गूंज से सम्पूर्ण विश्व गुंजायमान होने लगते हैं। ऐसी मान्यता है कि जैसे ही आषाढ़ मास में शुक्ल पक्ष एकादशी को श्री हरी विष्णु चार महीने के लिए योग निद्रा में चले जाते हैं और इसी के साथ-साथ सृष्टि के पालन की जिम्मेदारी भगवान शिव शंकर ले लेते हैं। इसी दौरान सभी प्रकार के शुभ कार्य चार महीनों तक बंद हो जाते हैं; जब तक कि विष्णु अपनी योग निद्रा से उठ नहीं जाते। श्रावण मास में प्रत्येक की गई पूजा सहस्त्र गुणा फल देती हैं क्योंकि जितना ये मास भगवान महादेव को प्रिय हैं उतना दूसरा कोई भी नहीं। इस मास में लोगों को नियमपूर्वक व्रत करने चाहिए और इसी के साथ-साथ रुद्राभिषेक भी करना चाहिए।
इसी मास में लोग दूध का त्याग कर शिव शंकर का रुद्राभिषेक भी करते हैं, इसी में वैज्ञानिक तथ्य है कि वर्षा ऋतु के दौरान घास और चारे में कीटाणु पनपने लगते हैं जो कि हमारे शरीर के लिए हानिकारक होते हैं। ये भी मान्यता है कि इसी मास में लोग अपनी प्रिय वस्तु का त्याग कर महादेव की उपासना में लग जाते हैं। विभिन्न प्रकार के पुष्पों जैसे:- मंदार, कनेर, धतूरा, आक पारिजात आदि से महादेव की पूजा अर्चना की जाती हैं, जो कि मोक्ष प्रदान करने वाली होती हैं।
इस मास के विषय में तो यहां तक गया हैं कि "केवल्म भूमिशायी तु कैलाशे वा स्मापनुयात, प्रात: स्नानेमासी अब्दम तत्पाल भागभात“ - अर्थात इस मास में जो प्राणी भूमि पर शयन करता है, वह मोक्ष प्राप्त करने के पश्चात साक्षात कैलाश पर्वत पर निवास करता है और इस मास में एक दिन भी किया गया स्नान सम्पूर्ण वर्ष में किए गए स्नान जितना फलदात्री होता है। इसीलिए कावड़ यात्रा का प्रारंभ भी इसी मास में होता है जब सम्पूर्ण राष्ट्र से लोग पवित्र नदियों से पैदल जल लाकर शिव शंकर का जलाभिषेक करते हैं।
ऐसी मान्यता है कि जब देवी सती हिमालय राज के घर पार्वती रूप में अवतरित हुई तब माता ने इसी मास में निराहार रहकर कठिन तप किया जिसके फलस्वरूप महादेव उन्हें पति रूप में प्राप्त हुए। इस मास की प्रतिपदा अग्नि देव को, तो द्वितीया तिथि ब्रह्मा को, तृतीया मां गौरी को, चतुर्थी गणपति को, पंचमी तिथि नाग देवता को तो वही षष्ठी तिथि कार्तिक जी को, सप्तमी तिथि सूर्य नारायण को तो अष्टमी तिथि शिव को, नवमी तिथि मां दुर्गा को, दशमी तिथि यम को, एकादशी तिथि विश्वेश्वर को, द्वादशी विष्णु को, त्रयोदशी तिथि कामदेव को, चतुर्दशी तिथि शिव शंकर को और पूर्णिमा तिथि चंद्रदेव को तथा अमावस्या पितृ देवों को समर्पित होती हैं।
श्रवण मास में वातावरण इतना सुंदर हो जाता हैं, मानो सम्पूर्ण प्रकृति महादेव का स्वागत कर रही हो, बारिश की बूंदों के साथ-साथ मोर और कोयल आदि की मधुर ध्वनि सबके मन को प्रफुल्लित करती है और प्रकृति की सुंदरता में चार चांद लगा देती हैं। पेड़-पौधों में नई बहार आ जाती हैं और सभी पौधे सुंदर फूलों से लद जाते हैं। इसी मास में उज्जैन के महाराज "महाकाल महाराज" विश्व में एक बार अपनी प्रजा का हाल-चाल जानने के लिए निकलते हैं, उन्हें 'गार्ड्स ऑफ ऑनर' दिया जाता हैं; तथा ऐसी मान्यता है कि उज्जैन में उनके सिवा किसी और की सत्ता नहीं है; इसीलिए संपूर्ण विश्व से लोग इस शोभा यात्रा को देखने के लिए आते हैं।
इसी के साथ-साथ लग जाइए अपनी श्रद्धा अनुसार आप भी शिव शंकर की भक्ति में, क्योंकि जितना महत्व हमारे शास्त्र मानस पूजा का बताते है, उतना महत्व किसी और पूजा का नहीं है।
"अकाल मृत्यु वो मरे जो काम करें चंडाल का,
काल उसका क्या करें जो भक्त हो महाकाल का"
लेखक - विष्णु दत्त, दिल्ली

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