अण्डवान का दशहरा - असली रावण का अंत: जंगल की दशहरा कथा
क्वाँर का महीना था और दोपहर का समय, सुनहरी धूप खिली हुई थी। सर्द-गर्म मिश्रित हवा फूलों की खुशबू को पूरे अण्डावन में बिखेर रही थी। पत्तियों की सरसराहट व पक्षियों के कलरव के बीच आज एक विशाल शीशम वृक्ष के नीचे जानवरों की मासिक सभा आयोजित थी। इस वर्ष दशहरा का पर्व मनाने की तैयारी सभा का प्रमुख विषय था। जानवरों ने मन में ठान लिया था कि इस बार दशहरा का त्यौहार बड़े धूमधाम से मनाया जाय। अब रामलीला मंचन के लिए पात्रों का चयन करना था। सोनू सियार सभी जानवरों को उनकी योग्यतानुसार भूमिका सौंपने लगा। किसी को राम की, किसी को सीता की, किसी को हनुमान की तो किसी को रावण की। इस तरह पात्र चयन की प्रक्रिया भी पूरी हुई।
सभा में उपस्थित एक बूढ़ा हाथी गज्जू को अपनी मन की बात नहीं रह गया। असंतोष व्यक्त करते हुए बोला -' भाइयों, हम हर साल दशहरा मनाते हैं। राम जन्म, राम वनवास, सीता हरण, लंका दहन और रावण वध जैसे दृश्य का अभिनय करते हैं; परन्तु यह सब करने से क्या फायदा ? इस वन का रावण तो जीवित है जिसका वध करना बहुत जरूरी है। इसी में हम सबकी भलाई है।‘
गज्जू हाथी की बात सभी को ध्यानाकर्षित करने लगी। सारे जानवर समझ गये कि गज्जू जी वनराज शेर सिंह की बात कर रहे हैं। शेरसिंह का स्मरण होते ही सबकी सिट्टी-पिट्टी गुम होने लगी। सभा में सन्नाटा पसर गया।
वनराज शेर सिंह की दुष्टता से सारा जंगल भयभीत था। उसके हृदय में दया, करूणा व क्षमा जैसे गुणों का कोई स्थान नहीं था। वह रोज कई जानवरों को अकारण मौत की घाट उतार देता था। कभी-कभी वह इतना निर्मम हो जाता था कि शावकों को अधमरा कर उन्हें तड़पते हुए छोड़ देता था। उसकी निर्दयता तब सीमा पार कर जाती जब वह शावकों को छोड़कर उनकी माँओं की इहलीला समाप्त कर देता था। इतने अत्याचार के बावजूद आज सभी जानवर दशहरा का पर्व मनाने की तैयारी में जुटे हुए थे।
सभा में खामोशी छाई देख गज्जू हाथी ने अपनी बात दोहराई - ' क्यों भाईयों, मेरी बातों पर गौर नहीं किया गया। मैंने कुछ गलत कहा...?‘
' नहीं... नहीं... गज्जू भैया आपने बिल्कुल सही बात कही है; परंतु हम उस दुष्ट को मारें तो मारें कैसे ?' पिंटू ऊँट गर्दन हिलाते हुए अपनी जगह से उठा।
' उन्हें मारा जा सकता है।' गज्जू हाथी ने पिंटू ऊँट की पीठ पर अपनी सूँड़ फेरते हुए उसे बिठाया- ' उसे हम में से कोई अकेला नहीं मार सकता, मैं यह भी जानता हूं अच्छी तरह।'
'फिर...?' चिकी चीता ने झट से पूछ बैठा।
चिकी की उत्सुकता पर मुस्कुराते हुए गज्जू हाथी बोला- ' बताता हूँ चिकी बेटा। ध्यान से सुनो। माथे पर जोर देते हुए गज्जू अपनी बात रखने लगा - ' साथियों, लंका के राजा पापी व अधर्मी रावण को श्री रामचंद्र जी ने अकेले ही नहीं मारा था। श्री रामचंद्र जी की जीत केवल उनकी ही जीत नहीं थी। उन्होंने भी पशु, पक्षी व अन्य वन्य प्राणियों की सहायता ली थी। वे एक होकर ही रावण पर विजयश्री प्राप्त की थी।'
'आप कहना क्या चाहते हैं दादाजी? ' टोनी बंदर ने अपनी आतुरता जाहिर की..
'यही कि हम सब एक होकर ही शेरसिंह को मारें।' गज्जू हाथी बोला।
'हाँ...हाँ...परंतु कैसे..?' सभी जानवरों ने पुनः गज्जू हाथी के समक्ष प्रश्नवाचक बात रखी - ' गज्जू जी, कुछ तो तरकीब बताइए। आप तो बस यूँ ही...। हम इसके लिए कुछ भी करने के लिए तैयार हैं। '
इस बार गज्जू हाथी को अपने साथियों में एकजुटता दिखी। उसने शेरसिंह को मारने की तरकीब बता दी। सारे जानवर खुश हो गये। शेरसिंह का काम तमाम करने के लिए सबने कमर कस ली। दशहरा की रात की प्रतीक्षा होने लगी।
दशहरा की रात आई। रामलीला मंचन हेतु कार्यक्रम आयोजित हुआ। एक सुसज्जित मंच बनाया गया। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि महोदय शेरसिंह को पूर्व नियोजित ढंग से मंच की ओर ले जाया गया। सभी जानवर एकत्रित थे। चिकी चीता व मनु खरगोश अतिथि महोदय की अगुवाई कर रहे थे। शिखा हिरणी स्वागतगीत के प्रस्तुतीकरण में व्यस्त थी। घमंड में मद शेरसिंह अपनी इस उपलब्धि पर फूला नहीं समा रहा था। तालियों की गूँज और वाद्य स्वर सुन शेरसिंह मुस्कुराते हुए अपनी आँसदी पर विराजित हो ही रहा था कि अचानक वह गिर गया। उठने की कोशिश करने लगा। उठ नहीं पाया। गिरता ही गया। आँसदी धँसती ही गयी। शेरसिंह दलदल में फंसता गया। उसे जानवरों की योजना समझ आ गयी। क्षमायाचना की दृष्टि से वह जानवरों से सहायता मांगने लगा; पर किसी ने उसकी कोई सहायता नहीं की। देखते ही देखते वनराज शेरसिंह दलदल में समा गया।
इस तरह आज सचमुच अण्डावन का रावण मारा गया। सारे जानवर रामराज्य की कल्पना से झूम उठे। इस बार अण्डावन का दशहरा मनाना सार्थक रहा।
लेखक - टीकेश्वर सिन्हा जी, "गब्दी वाला", घोटिया-बालोद (छत्तीसगढ़)

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