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श्री राम सीता का विवाह | विवाह पंचमी

Vivah Panchami
श्रीराम सीता का विवाह | विवाह पंचमी

भगवान श्री राम चेतना और माता सीता प्रकृति शक्ति की प्रतीक हैं। चेतना व प्रकृति का मिलन का योग असाधारण है। मार्गशीर्ष शुक्ल पंचमी को यह विशेष योग भगवान श्रीराम और माता सीता के विवाह उत्सव के रूप में मनाया जाता है। इसे "विवाह पंचमी" कहते हैं। वाल्मीकि रामायण के अनुसार जब प्रभु श्री राम और माता सीता का विवाह हुआ था, उस समय श्रीराम की उम्र 13 वर्ष तथा माता सीता की उम्र 6 वर्ष थी। विवाह के बाद श्री राम 6 साल जनकपुरी में रहे और 12 वर्ष की आयु होने पर माता सीता अयोध्या गई थीं। माता सीता के स्वयंवर से संबंधित पौराणिक कथा है जो रामायण की प्रमुख घटनाओं में से एक है ।

सीता स्वयंवर -

सीता माता राजा जनक की पुत्री होने के साथ ही धरती माता की भी पुत्री थी इसलिए सीता माता को "भूमिजा" भी कहते हैं । सीता माता असाधारण कन्या व शक्ति का रूप थी जिस शिव धनुष को रावण भी नहीं हिला सका उसे माता ने आसानी से एक स्थान से दूसरे स्थान रख दिया था इसलिए राजा जनक चाहते थे कि सीता जी का विवाह उसी व्यक्ति से हो जो सीता जैसी प्रतिभाओं की विलक्षण शक्ति रखता हो। इसी कारण स्वयंवर रचा गया एवं शर्त रखी गई कि जो शिव धनुष को उठाकर उसकी प्रत्यंचा को चढ़ाएगा, उसी से सीता विवाह संपन्न होगा। शिव धनुष को कोई राजा नहीं उठा सका तब वहां गुरु की आज्ञा के कारण साधु वेश में श्री राम ने धनुष को एक ही हाथ से उठाकर प्रत्यंचा चढ़ाने के लिए मोड़ा और वह दो भागों में टूटकर विभाजित हो गया। वह शुभ दिन था पंचमी का और उसी दिन दोनों का विवाह संपन्न हुआ। भगवान राम और सीता का विवाह होने के बाद विवाह पंचमी तिथि पर ही उनकी तीनों बहनों उर्मिला माधवी और श्रुतकीर्ति का विवाह लक्ष्मण भरत और शत्रुघ्न से कराया गया ।विवाह के बाद वैसे तो कई हीरे जवाहरात और राशि दासियों  को भेंट में दी गई थी लेकिन माता जानकी अपने साथ काली माता की एक मूर्ति लेकर आई थी जिसे अयोध्या में प्रतिष्ठित किया गया। जिसे छोटी देवकाली के नाम से जाना जाता है। यह मूर्ति आज भी अयोध्या के बीचो-बीच विराजमान हैं बताया जाता है पार्वती जी का रूप काली यहां सर्वमंगला महागौरी के रूप में विराजमान है।





श्रीराम सीता का विवाह
श्रीराम सीता का विवाह
इस दिन विवाह करने से डरते हैं लोग, क्यों? –

कई जगहों पर इस तिथि को शुभ नहीं माना जाता है। मिथिलांचल व नेपाल में कन्या विवाह वर्जित है। लोगों की मान्यता है कि विवाह के बाद प्रभु श्री राम और देवी सीता को कई दुखों का सामना करना पड़ा था इसी कारण विवाह पंचमी के दिन विवाह करना उत्तम नहीं माना जाता है। दोनों को एक साथ रहने का सौभाग्य नहीं मिल पाया, इसलिए भी इस तिथि को विवाह के लिए उचित नहीं मानते हैं। दूसरे पक्ष से यह मान्यता भी है कि अगर विवाह होने में बाधा आ रही है तो विवाह पंचमी पर ऐसी समस्याएं दूर हो जाती है। मनचाहे विवाह का वरदान भी मिलता है। बाल्य कांड में भगवान राम और सीता जी के विवाह प्रसंग का पाठ करना शुभ होता है संपूर्ण रामचरितमानस का पाठ करने से भी पारिवारिक जीवन सुख में होता है।

विवाह एवं पूजन विधि -

सुबह के वक्त स्नान करें व श्री राम विवाह का संकल्प लें। भगवान राम व सीता की मूर्ति स्थापित करें इस दिन विशेष रंग के वस्त्रों का धारण किया जाता है श्रीराम पीले रंग और सीता माता को लाल रंग के वस्त्र धारण करवाते हैं। "ॐ जानकी वल्लभाय नमः" का जाप किया जाता है और साथ ही विवाह प्रसंग का पाठ किया जाता है। माता सीता और भगवान राम का गठबंधन किया जाता है आरती की जाती है फिर गांठ लगे वस्त्रों को अपने पास रखा जाता है शीघ्र विवाह और सब कुशल वैवाहिक जीवन की प्रार्थना की जाती है यथाशक्ति जप किया जाता है और निम्न दोहे का भी जाप किया जाता है  -
पाणिग्रहण जब कीन्ह महेसा। हियँ हरषे तब सकल सुरेसा॥
बेद मन्त्र मुनिबर उच्चरहीं। जय जय जय संकर सुर करहीं॥





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