भारतीय परम्परा

गोवर्धन पूजा

श्री गोवर्धन पूजा एवं प्राकट्य

गोवर्धन पूजा या अन्नकूट पर्व दिवाली के अगले दिन मनाया जाता है। कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को गोवर्धन उत्सव मनाया जाता है। इस दिन लोग घर के आंगन में गोबर से गोवर्धन पर्वत का चित्र बनाकर गोवर्धन भगवान की पूजा करते हैं। इस दिन गायों की सेवा का विशेष महत्व है। इस दिन के लिए मान्यता प्रचलित है कि भगवान कृष्ण ने वृंदावन धाम के लोगों को तूफानी बारिश से बचाने के लिए पर्वत अपने हाथ पर ऊठा लिया था। तो चलिए जानते हैं क्या है इसकी कहानी।





ऋषि पंचमी का त्यौहार, माहेश्वरी रक्षाबंधन का पर्व

ऋषि पंचमी का त्यौहार | माहेश्वरी रक्षाबंधन

सप्त ऋषियों का आशीर्वाद प्राप्त करने और सुख, शांति, मंगल और समृद्धि की कामना से यह व्रत रखा जाता हैं। इस दिन सप्त ऋषि की विधि विधान से पूजा की जाती है एवं कथा कही जाती है। यह व्रत पापों का नाश करने वाला व श्रेष्ठ फलदायी माना जाता है।

दही हांडी का पर्व

दही हांडी का त्यौहार

लीलाधर भगवान कृष्ण की लीलाओं में से एक लीला माखन चुराना था, जिसमे वो अपने दोस्तों के साथ मिलकर माखन चुराते थे| इससे परेशान होकर माता यशोदा और गोपियाँ माखन को एक मटके में भरकर ऊंचाई पर रस्सी से बांध करके लटका देती थी| फिर भी बाल गोपाल अपने दोस्तों के साथ मिलकर वो माखन चुरा लेते थे इसलिए उनको माखनचोर भी कहा जाता है| भगवान कृष्ण के जन्मोत्सव के अगले दिन उनकी याद में सभी कृष्ण भक्त दही हांडी का पर्व मनाते हैं|





आदि पेरुक्कु का त्यौहार

आदि पेरुक्कु का त्यौहार

आदि पेरुक्कू को "पैर पडिनेटम पेरुक्कू" भी कहा जाता है| इस पर्व का पहला दिन "आदि पंड़िगै या आदि पिराप्पू" के रूप में मनाया जाता है यह दिन नवीन कार्यों के लिए उत्तम माना गया है| इस दिन सभी महिलाएं अपने घर के दरवाजो को आम के पत्तों से सजाती है| नारियल के दूध और वडाई से तैयार 'पायसम' नामक व्यंजन बनाया जाता है और इसी के साथ भगवान की पूजा की जाती है| पेरक्कु एक महीना होता है जिसमे समृद्धि और खुशहाली के लिए जल-बल और प्राकृतिक शक्तियों की प्रार्थना होती है|





आदि पेरुक्कु का त्यौहार

पंढरपुर की 'वारी'

आषाढी एकादशी (देव शयनी एकादशी) के दिन महाराष्ट्र के चंद्रभागा नदी के तट पर बसे हुए पंढरपुर में यह महायात्रा होती है। इस यात्रा में महाराष्ट्र के कोने-कोने से और बाहर से भी लोग आते हैं। किसी भी जाति या धर्म का कोई बंधन नहीं, जिसके मन में भक्ति भाव हो वह हर इंसान इस यात्रा का हिस्सा बन सकता है। पंढरपुर के भगवान विट्ठलनाथ से मिलने के लिए लोग अपने घर से पैदल यात्रा करने के लिए निकलते हैं उसे 'वारी' कहते हैं और उन लोगों को 'वारकरी' ।

जगन्नाथ पुरी रथयात्रा

जगन्नाथ पुरी रथयात्रा

रथयात्रा में भगवान जगन्नाथ, उनके बड़े भाई बलराम और छोटी बहन सुभद्रा तीनों अलग-अलग रथों पर सवार होते हैं। जिसमे सबसे आगे बलराम का रथ "ताल ध्वज" जिसका रंग लाल और हरा होता है, फिर बहन सुभद्रा का रथ "दर्पदलन" या "पद्म ध्वज" जो काले या नीले और लाल रंग का होता है और सबसे पीछे भगवान जगन्नाथ का रथ "नन्दीघोष" या "गरुड़ध्वज" चलता है। जिसका रंग लाल और पीला होता है। रथों को उनके रंग और ऊंचाई से आसानी से पहचाना जा सकता है।





Guru Purnima Festival

क्यों मनाई जाती है आषाढ़ की पूनम को गुरु पूर्णिमा | गुरु पूर्णिमा

आषाढ़ शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा का यह पर्व महार्षि वेद व्यास जी के जन्मदिवस के रूप में मनाया जाता है। शिवपुराण के अनुसार अठ्ठाईसवें द्वापर में महर्षि वेदव्यास जी का जन्म आषाढ़ पूर्णिमा को लगभग 3000 ई. पूर्व में हुआ था। उनके पिता का नाम ऋषि पराशर है | वेद व्यास जी को विष्णु भगवान का अंशावतार माना जाता है | इनको कृष्णद्वैपायन के नाम से भी जाना जाता है |

Guru Purnima Festival

गुरु पूर्णिमा

हमारे भारत को विविधता का स्वरूप माना जाता है| यहां अनेक धर्म और जाति के लोग रहते हैं | इन सबके विभिन्न प्रकार के त्यौहार, खानपान, वेशभूषा सभी मे विविधता है| सभी लोग अपने अपने त्यौहार सही ढंग से मनाते हैं| उन्हीं में से एक है हमारा भारतीय त्यौहार "गुरु पूर्णिमा" जो कि हर धर्म, हर जाति के लोग इसे मनाते हैं| "गुरु पूर्णिमा" यह हिंदू पंचांग के अनुसार आषाढ़ शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को मनाया जाता है| "गुरु पूर्णिमा" को व्यास पूर्णिमा भी कहां जाता है| इसी दिन महर्षि वेदव्यास जी का जन्मदिवस भी मनाया जाता है| महर्षि वेदव्यास इनको सर्वश्रेष्ठ गुरु माना गया है|





अक्षय तृतीया

क्यों मनाई जाती है अक्षय तृतीया?

वैशाख माह की तृतीय तिथि को स्वयंसिद्ध मुहूर्तमाना जाता है। इस दिन कोई भी शुभ कार्य करने के लिए पंचागं देखने की जरूरत नहीं है। पौराणिक ग्रंथों के अनुसार यह तिथि बहुत ही पुण्यदायी तिथि है, इस दिन किये गए जो भी शुभ कार्य और दान आदि का फल अक्षय होता है यानी कई जन्मों तक इसका लाभ मिलता है। इसी कारण अक्षय तृतीया को "अक्षय फलदायी" भी कहते है।

gangaur vrat

गणगौर का व्रत एवं पूजा

चैत्र माह की शुक्ल पक्ष की तृतीया को गणगौर का व्रत किया जाता है | यह व्रत महिलाये अपने पति की लम्बी आयु के लिए और कुंवारी कन्याएँ मनचाहे पति की प्राप्ति के लिए रखती है | गणगौर की पूजा 16 दिन तक होती है जो होली पर्व के दूसरे दिन से शुरू होकर गणगौर के दिन पूरी होती है | शुरू के 8 दिन होली और गोबर की पिंडियो से और बाद के 8 दिन ईसर गौर से पूजा होती है |





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