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चेटीचंड का त्योहार क्यों मनाते है ? | झूलेलाल जयंत

चैत्र शुक्ल द्वितीया से सिंधी नववर्ष प्रारम्भ होता है। जिसे चेटीचंड के नाम से जाना जाता है। चैत्र मास को सिंधी में "चेट" कहा जाता है और चांद को "चण्डु", इसलिए चेटीचंड का अर्थ "चैत्र का चांद" होता है | चेटीचंड का यह त्योहार "चेती चाँद " और "झूलेलाल जयंती" के नाम से भी जाना जाता है| सिंधी समुदाय का यह त्योहार भगवान झूलेलाल के जन्मोत्सव के रूप में भारत, पाकिस्तान और सिंध प्रदेश में हर्षोल्लास से मनाया जाता है। 

भगवान झूलेलाल का जन्म सदभावना और भाईचारा बढ़ाने के लिए हुआ था। इनके उपासक भगवान झूलेलाल को उदेरोलाल, घोड़ेवारो, जिन्दपीर, लालसाँई, पल्लेवारो, ज्योतिनवारो, अमरलाल आदि नामों से भी पूजते हैं। इनको जल और ज्योति का अवतार माना गया है, इसलिए लकड़ी का मंदिर बनाकर उसमें एक लोटे से जल और ज्योति प्रज्वलित की जाती है और इस मंदिर को श्रद्धालु चेटीचंड के दिन अपने सिर पर उठाते हैं, जिसे "बहिराणा साहब" भी कहा जाता है। सिंधी समाज के लोग शोभा यात्रा का आयोजन करते है जिसमें 'छेज' (जो कि गुजरात के डांडिया के समान ही एक लोकनृत्य होता है) के साथ झूलेलाल की महिमा के गीत गाते हैं। ताहिरी (मीठे चावल), छोले (उबले नमकीन चने) और शरबत का प्रसाद बांटा जाता है। शाम को बहिराणा साहिब का विसर्जन किया जाता है।

 

भगवान झूलेलाल
कौन है भगवान झूलेलाल ?

संवत् 1007 में पाकिस्तान में सिंध प्रदेश के ठट्टा नगर में मिरखशाह नाम का एक मुगल राजा राज्य करता था। उसने अत्याचार करके हिंदू धर्म के लोगों को जबरन इस्लाम स्वीकार करवाया। उसके जुल्मों से परेशान हो कर एक दिन सभी पुरुष व महिलाये बच्चो और बुजुर्गो के साथ सिंधु नदी के पास एकत्रित हुए और भगवान का स्मरण करने लगे। उन सभी के कठोर तप परिणामस्वरूप सिंधु नदी में से एक बहुत बड़े नर मत्स्य पर बैठे हुए भगवान झूलेलाल प्रकट हुए पल भर के बाद ही वह आकृति सभी भक्तजनों की आंखों से ओझल हो गई। तभी आकाशवाणी हुई कि हिंदू धर्म की रक्षा के लिए मैं कुछ दिनों के बाद श्रीरतनराय के घर में माता देवकी की कोख से जन्म लूंगा। निश्चित समय पर चैत्र माह की द्वितीया को रतनरायजी के घर एक सुंदर बालक का जन्म हुआ, जिसका नाम उदयचंद रखा गया।

मिरखशाह को जब उस बालक के जन्म की खबर पहुंची, तो वह अत्यंत विचलित हो गया और उसने इस बालक को मारने की योजना बनाई परंतु वह सफल नहीं हो पाया। तेजस्वी मुस्कान वाले बालक को देखकर उसके मंत्री दंग रह गए। तभी अचानक वह बालक वीर योद्धा के रूप में नीले घोड़े पर सवार होकर सामने खड़ा हो गयाऔर अगले ही पल वह बालक विशाल मछली पर सवार दिखाई दिया। सभी मंत्रीयो ने घबराकर उनसे माफी मांगी। बालक ने उस समय मंत्रीयो को कहा कि वह अपने हाकिम को समझाए कि अपनी प्रजा पर अत्याचार न करे, लेकिन फिर भी मिरखशाह नहीं माना। तब भगवान झूलेलाल ने एक वीर सेना का संगठन किया और मिरखशाह को हरा दिया। तब मिरखशाह भगवान झूलेलाल की शरण में आ गया इसके कारण उसके प्राण बच गये। 

अपने चमत्कारों के कारण बाद में उन्हें "झूलेलाल और लालसांई" के नाम से सिंधी समाज और "ख्वाजा खिज्र जिन्दह पीर" के नाम से मुसलमान पूजने लगे। 
भगवान झूलेलाल संवत् 1020 भाद्रपद की शुक्ल चतुर्दशी के दिन अन्तर्धान हो गए। 

 

  

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